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70 साल से उपेक्षित भारत के छोटे और सीमांत किसानों की देखभाल कर रही है मोदी सरकार

अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ एक नीति आजमाई थी फूट डालो राज करो। आज़ादी के बाद अंग्रेजों से प्रेरित सरकारों ने इस नीति को कायम रखा। दुर्भाग्य ये रहा कि किसानों को भी विभाजन की इस विभीषिका को झेलना पड़ा। लगभग सात दशकों से भारत के किसानों के बीच एक विभाजन मौजूद रहा। एक ऐसा विभाजन जिसके बारे में किसी ने कभी बात नहीं की। बड़े, संपन्न किसानों और बड़ी संख्या में छोटे किसानों के बीच विभाजन। ऐसा क्यों हुआ कि दशकों से पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियां भी बड़ी संख्या वाले छोटे किसानों के हित को नजरअंदाज करती रहीं। इस भेदभाव को पाटने, छोटे किसानों के कठिन जीवन को आसान करने, अग्रणी बदलाव का काम इतना मुश्किल क्यों कर दिया गया था? भारत के छोटे किसानों की देखभाल कौन करेगा?

'भारत के नए कृषि सुधारों में किसानों की आय बढ़ाने की क्षमता है'-आईएमएफ प्रमुख, गीता गोपीनाथ

बावजूद इसके ये सुधार अंतहीन बहस का विषय बना दिए गए हैं और केवल कुछ राज्यों से उपजा विरोध दिल्ली के बॉर्डर पर जमा होकर इसे और भी भ्रामक बना रहा है।

आज हम देश के एक बेहद संवेदनशील विषय पर बात करने जा रहे हैं। भारत के बड़े और छोटे किसानों के बीच चौंका देने वाला यह अनुचित अंतर।

चौधरी चरण सिंह अक्सर 1970-71 एग्रीकल्चर सेंसेस का ज़िक्र किया करते थे। किसानों का सेंसस लिया गया,तो 33 फ़ीसदी किसान ऐसे थे जिनके पास दो बीघे से भी कम ज़मीन थी, 18 फ़ीसदी ऐसे जिनके पास दो से चार बीघे ज़मीन। ये 51 फ़ीसदी किसान कितनी भी मेहनत कर लें, अपनी ज़मीन पर इनकी गुज़र नहीं हो सकती।”- पीएम नरेंद मोदी

अमीर किसान बनाम छोटे और सीमांत किसान

पहले कुछ आंकड़ों पर नजर डालते हैं। हाल के आंकड़ों के मुताबिक  अगर हम भारत में 1 हेक्टेयर से कम भूमि वाले सीमांत या सूक्ष्म किसानों को देखें  तो यह हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 68% हो गई है। 1971 की जनगणना के अनुसार तब यह आंकड़ा 51% था। इसका मतलब यह है कि देश भर में सूक्ष्म किसानों की संख्या बढ़ी है। इसके अलावा अगर हम इन्हें 2 हेक्टेयर से कम भूमि वाले छोटे किसानों के साथ मिलाते तो यह भारत में खेत की जोत का 86% हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि आजादी के बाद और विशेष रूप से 1971 के बाद की सरकारों की नीतियों ने अमीर किसानों की एक छोटी नस्ल बनाते हुए लगभग जीविकोपार्जन स्तर पर रहने वाले किसानों की संख्या में वृद्धि की है।

 

मौजूदा वक़्त में जिनके पास एक हेक्टेयर से कम ज़मीन है, वो आज 68 फ़ीसदी हैं। 86 फ़ीसदी किसानों के पास 2 हेक्टेअर से भी कम ज़मीन है। ऐसे किसानों की संख्या 12 करोड़ है। क्या हमें अपनी योजनाओं के केंद्र में 12 करोड़ किसानों को रखना होगा या नहीं।‘ –पीएम नरेंद्र मोदी

छोटे किसानों का हो रहा था शोषण

ये हालात चिंताजनक है। सीधे शब्दों में कहें तो पिछली सरकारों ने  14% अमीर किसानों को कठिन परिश्रम करने वाले छोटे और सूक्ष्म किसानों किसानों पर लगभग एकाधिकार बनाए रखने की अनुमति दी। क्या ये शोषण नहीं है ?

कर्ज के दुष्चक्र में ऐसे फंसता है छोटा किसान

अब जरा एक नजर सूक्ष्म किसानों पर डालते हैं जो खेती करने का फैसला करता है। वो बैंक लोन कैसे लेगा जब बैंक में उसका खाता भी नहीं है। अब उसे या तो स्थानीय साहूकार से कर्ज लेना पड़ता है या मौजूदा कमीशन एजेंट से ज्यादा दरों पर और ये  दोनों विकल्प सीधे अमीर संपन्न किसानों से जुड़े होते हैं। यह किसान, अपनी छोटी भूमि जोत के कारण स्केल और उचित मशीनीकरण की अर्थव्यवस्थाओं को शामिल करने में असमर्थ है। कड़ी मेहनत करता है फिर जाकर अच्छी उपज का प्रबंधन करता है, लेकिन योजनाओं के दायरे से छिटकने के कारण वो अपनी उपज को न्यूनतम दर पर एजेंट को बेचने के लिए मजबूर होता है, जिससे वो अपने ऋण का भुगतान भी नहीं कर पाता। इस तरह वो कर्ज के दुष्चक्र में फंसता जाता है।

इससे भी बदतर हालात तब होती है जब किसी आपदा की वजह से छोटा और सूक्ष्म किसान अपनी उपज से ही हाथ धो देता है। वो इसलिए कि यह किसान अपनी फसल का बीमा करवाने में असमर्थ था। जब मौजूदा बैंकिंग इतिहास ही नहीं, एकाउंट ही नहीं तो कैसा लोन कैसा बीमा या कोई भी अन्य लाभ। अब ये किसान क्या करे? अब तो वो बुरी तरह घाटे में घिर गया है वो फिर से साहूकार के सामने गिड़गिड़ाए और कर्ज के बोझ तले दबता जाए।

छोटे किसानों के लिए कर्ज माफी महज दिखावा

फिर एक पार्टी सत्ता में आती है, जो सभी छोटे किसानों से कर्ज माफी का वादा करती है। अब चाहे आप हों या हम इस अवसर को दोनों हाथों से लपकने की कोशिश करेंगे, पर झटका तब लगता है  कि इन ऋण छूटों का लाभ तो उन्हीं समृद्ध किसानों को मिलता है, जिन्होंने छोटे किसानों को पैसा और संसाधन दिया था।

 चुनाव आते ही कर्ज़ माफ़ी जैसी घोषणाएं की जाती हैं, जिसका लाभ छोटे किसानों को नहीं होता है। हमें छोटे किसानों के लिए सोचने की ज़रूरत है।

पीएम नरेंद्र मोदी

औपचारिक प्रणाली के बिना, गरीब किसान खुद को आर्थिक तंत्र के बाहर पाते हैं। अब सोचिए कि अगर छोटे किसानों को, जिन्हें कर्ज माफी की सख्त जरूरत थी उनका कर्ज माफ होने को कौन कहे तो वो और बढ़ता गया,  आखिर पैसा गया कहां?  इसका फायदा किसे हुआ?  छोटे किसानों के साथ क्या हुआ?

6 वर्षों से छोटे और सीमांत किसानों के दिन बदले

लगभग 70 वर्षों तक छोटे किसानों के साथ यही होता आया, लेकिन बीते 6 वर्षों से छोटे और सीमांत किसानों पर पूरा ध्यान दिया जाने लगा और उन्हें कर्ज के जाल से मुक्ति दिलाने के युद्धस्तर प्रयास हो रहे हैं।

वित्तीय समावेशन का पहला कदम

परिवर्तन लाने का पहला कदम 118.8 मिलियन कृषकों के लिए वित्तीय समावेशन के साथ बढ़ा। 2014 में शुरू की गई पीएम जन धन योजना के साथ, बैंकिंग सेवाओं की पहुंच रखने वाले भारतीयों की कुल संख्या में 53% की वृद्धि हुई। यह आंकड़ा 2018 में 80% को पार कर गया और फिलहाल सभी भारतीयों को बैंकिंग सेवा से जोड़ने का लगातार प्रयास किया जा रहा है। बैंक एकाउंट ने  प्रत्यक्ष लाभ स्थानान्तरण यानि कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर को एक नया रूप दे दिया। प्रत्येक खाताधारक, प्रत्येक सीमांत और लघु किसान, अब अपनी बचत और एक औपचारिक लिंक तक पहुंच रखने लगा, जिसके माध्यम से वे किसान मानकीकृत और यहां तक कि रियायती दरों पर ऋण के लिए आवेदन कर सकने में सक्षम हो पाए। सूक्ष्म सिंचाई पर एक नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने से छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका बेहतर हुई।

समावेशी फसल बीमा की शुरुआत

अगली बड़ी घोषणा एक समावेशी फसल बीमा योजना की शुरुआत थी। पीएम फसल बीमा योजना ने बढ़े हुए जोखिम कवर की पेशकश की। इस योजना ने सरकारी सब्सिडी पर ऊपरी सीमा को हटा दिया और यहां तक कि स्थानीय आपदाओं के मामले में भी जोखिम कवरेज को बढ़ा दिया।

पीएम किसान योजना ने करोड़ों किसानों को सहारा दिया

उन लोगों को मजबूत बनाने के लिए जिन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, पीएम किसान योजना द्वारा छोटे और सीमांत किसानों के बैंक खातों में सीधे समर्थन आय ट्रांसफर शुरु हुआ। करोड़ों की संख्या में छोटे किसानों को दिए जाने वाले इस वार्षिक समर्थन आय के मायने बड़े हैं, जो छोटे किसानों को न सिर्फ आवश्यक कृषि जरूरतों की खरीद की हिम्मत देता है, बल्कि ऋण-मुक्त एक बेहतर कल की भी उम्मीद जिंदा रखता है।

 

‘2014 के बाद हमने कई बदलाव किये हैं और फसल बीमा के दायरे को बढ़ा दिया है। फसल बीमा के तहत 90 हज़ार करोड़ रुपये दिये गए हैं। इसके साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड भी आवंटित किया गया है। किसान सम्मान निधि योजना के तहत 10 करोड़ किसानों को इसका लाभ मिला है।

पीएम नरेंद्र मोदी

PM-KISAN के तहत 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहले ही जारी की जा चुकी है और इस योजना में अब अविश्वसनीय 11.53 करोड़ लाभार्थी हैं। जब एकमुश्त 50,000 करोड़ रुपये की ऋण माफी के वादे से इसकी तुलना की जाती है तो पीएम किसान का पलड़ा कहीं ज्यादा भारी नजर आता है।

नए कृषि सुधार से मजबूत होंगे किसान

एक आवश्यक और जरूरी कदम नए सुधारों के साथ आया है जो किसानों के बीच इस अदृश्य विभाजन की दीवार को ढहा देते हैं। इन सुधारों से हर किसान चाहे वो छोटा हो, सीमांत हो या संपन्न अपनी मर्जी से जहां चाहे अपनी उपज को मनमुताबिक कीमत पर बेचने के लिए स्वतंत्र हो जाता है।  यही कानून अनुबंध खेती के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं। अब हर किसान अपनी पसंद के मुताबिक अनुबंध खेती का लाभ उठाकर एक बड़ी अर्थव्यवस्था का भागीदार होगा।

 

मनमोहन सिंह जी ने ख़ुद भारत के किसान को उपज बेचने की आज़ादी दिलाने, भारत को एक कृषि बाज़ार दिलाने के संबंध में अपना विचार दिया था, और अब वो हम कर रहे हैं।‘-पीएम नरेंद्र मोदी

 

किसान अनुबंध के माध्यम से सभी मशीनीकरण, उच्च पैदावार और बेहतर सेवाओं जैसी प्रौद्योगिकी का लाभ उठाएंगे और अपनी आय बढ़ाएंगे। ये कृषि सुधार सही मायने में भारत के अनन्दाताओं को आत्मनिर्भरता की दहलीज पर पहुंचाने के लिए आखिरी कदम हैं।

क्या किसान आंदोलन को राजनीति की आंच पर नहीं चढ़ाया गया है?

आखिर सिर्फ चुनिंदा राज्य ही विरोध क्यों करते दिख रहे हैं? क्या इसलिए कि राष्ट्रीय राजधानी की सीमा वाले इन राज्यों में बड़े किसानों की संख्या सबसे ज्यादा है? ये विरोध बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु या उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों जैसे राज्यों में क्यों नहीं फैला? सरकारी समर्थन जमा करने और अपने परिश्रमी साथियों को पीछे छोड़ने के लिए यह छोटा क्यों होगा? इस तरह के ठोस प्रयासों के बावजूद विरोध क्यों नहीं फैल रहा है? हम उस बारे में बात क्यों नहीं कर रहे हैं? भारत के छोटे किसानों की देखभाल कौन करेगा?

70 सालों से उपेक्षित छोटे किसानों की ये दर्द भरी हकीकत थी। हमें यकीन है कि आप देश के समझदार और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते कथित किसान आंदोलन और नए कृषि सुधार कानूनों की सच्चाई आसानी से परख सकते हैं।

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