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राम मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाने वाले आधुनिक ‘मंथराओं’ का षड़यंत्र!

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नारायण प्रभु श्री राम ने मानव रूप में अवतार लिया तो मानव जीवन में उन्हें दुनियावी परेशानियों का सामना करना पड़ा। प्रभु राम ने हर संघर्ष-संकट को सहर्ष स्वीकर किया और उनसे लड़े, लेकिन त्रेता युग में कैकेयी की दासी मंथरा की तिकड़मों ने भगवान राम को 14 साल के वनवास का दर्द भी दिया। कलयुग में भी मंथराओं की कमी नहीं हैं। सैकड़ों साल से राम विरोधी मंथराओं ने राजनीति के कारण प्रभु राम को अपने ही घर अयोध्या में निर्वासन की जिंदगी दे रखी थी। 5 अगस्त को प्रभु राम वापस अपने घर में विराज रहे हैं। आइए जानते हैं कलयुग के उन मंथराओं के बारे में जिन्होंने राम मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाए।

वामपंथी इतिहासकारों का दुष्चक्र

वामपंथी इतिहासकारों ने दुष्चक्र रचते हुए नवंबर 1989 में सीएचएस, जेएनयू ने “इतिहास का राजनीतिक दुरुपयोग: बाबरी मस्जिद – रामजन्मभूमि विवाद – 25 इतिहासकारों का विश्लेषण” जारी किया और अयोध्या परिचर्चा में शामिल हुए। कांग्रेस समर्थित राजनीति से प्रेरित प्रोफेसर एस गोपाल, रोमिला थापर और बिपिन चंद्र प्रमुख हस्ताक्षरकर्ता थे। जेएनयू के इतिहासकारों के झूठे दावों के अनुसार 19 वीं शताब्दी से पहले अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर का कोई उल्लेख नहीं था। न तो अबुल फजल और न ही तुलसीदास ने इसका उल्लेख किया। जेएनयू के इतिहासकारों ने इस धारणा पर भी सवाल उठाया कि “मुस्लिम शासक हमेशा और स्वाभाविक रूप से हिंदुओं के पवित्र स्थानों के विरोध में थे”। उन्होंने सिफारिश की कि रामजन्मभूमि को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाए।

मंथरा के उत्तराधिकारी कथित इतिहासकार
  • प्रोफेसर आर एस शर्मा ने कहा कि अयोध्या “बहुत लंबे समय तक चलने वाला तीर्थ नहीं है”। उन्होंने कहा कि “राम मंदिर को ध्वस्त कर इस स्थान पर एक मस्जिद खड़ी की गई थी कि इस दृष्टिकोण का समर्थन करने के लिए ऐतिहासिक साक्ष्य का एक टुकड़ा नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि “हिंदू कला और वास्तुकला के एक प्रेमी (बाबर) को राम मंदिर के विनाश का श्रेय दिया जाना, जो किसी भी मामले में अस्तित्व में नहीं था”।
  • अप्रैल 1990 में प्रो. रोमिला थापर ने “रामायण के विभिन्न संस्करणों” पर बात करते हुए वाल्मीकि की रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।

जबकि तथ्य ये है कि: वाल्मीकि की कहानी को प्रभु राम के जीवन के सबसे शुरुआती सजीव संस्मरण के रूप में स्वीकार किया जाता है। वाल्मीकि की कहानी का मुख्य भाग श्रीराम के भगवान रूप का वर्णन करता है।

वामपंथी इतिहासकारों ने सदियों पुरानी मान्यता का विरोध करने का प्रयास किया और यह दावा करने का प्रयास किया कि बाबरी मस्जिद जमीन के खाली टुकड़े पर बनाई गई थी।

इनमें से कुछ इतिहासकार BMAC के विशेषज्ञ के रूप में दिखाई दिए

  • पीएम वीपी सिंह और चंद्रशेखर के अधीन ओएसडी, अयोध्या कुणाल किशोर ने कहा कि “इतिहास का राजनीतिक दुरुपयोग: बाबरी मस्जिद – रामजन्मभूमि विवाद – 25 इतिहासकारों के विश्लेषण ने झूठा दावा किया कि बाबरी एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक था।
  • आरएस शर्मा, एम अतहर अली, डीएन झा और सूरजभान, इन चार ‘इतिहासकारों’ ने 1991 में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री को अपनी रिपोर्ट को ‘रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद: ए हिस्टोरियन रिपोर्ट टू द नेशन’ शीर्षक देते हुए एक पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि मंदिर के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं था।
इरफान हबीब का दुष्प्रचार!

इरफान हबीब ने एक जबरदस्त अभियान चलाया कि त्रेता का ठाकुर शिलालेख लखनऊ संग्रहालय से चुराया गया था और 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में रखा गया था। 2002 में उन्होंने आरोप लगाया कि विष्णु हरि शिला एक योजना थी और यह एक निजी संग्रह का था। भारतीय इतिहास कांग्रेस 2006 में उन्होंने कहा कि शिलालेख को लखनऊ संग्रहालय से हटा दिया गया है और ऐसा जताया जा रहा है कि बाबरी मस्जिद में ये खोजा गया है। अब एक चित्र प्रकाशित किया गया है जो इस बात को स्थापित करता है कि 1992 में मिले त्रेता का ठाकुर और विष्णु हरि शिलालेख अलग-अलग शब्द हैं।

डी मंडल का राम मंदिर विरोधी प्रयास!
  • डी ​​मंडल, एक प्रो-बाबरी पुरातत्वविद् ने  अपनी पुस्तक, अयोध्या: पुरातत्व के बाद विध्वंस में बीबी लाल के निष्कर्षों को खारिज करने का प्रयास किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में मंडल ने कबूल किया कि उनकी किताब मुख्य रूप से बाबरी मस्जिद के पास प्रोफेसर लाल द्वारा ली गई तस्वीर पर आधारित थी। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, डी मंडल “पीएचडी नहीं है, लेकिन कई लोगों को उनके मार्गदर्शन में पीएचडी से सम्मानित किया गया है।”
  • सीता राम रॉय कहते हैं कि रामचरितमानस में अवध या कोशल का उल्लेख है, न कि अयोध्या का।
  • सबसे बड़ी बात ये कि इन वामपंथी कथित इतिहासकारों ने सिर्फ राजनीति से प्रेरित होकर और एक पार्टी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए ये अनर्गल इतिहास लिखा। अदालतों में इनमें से कईयों ने स्वीकीर किया कि उन्होंने तथ्यों पर कम ध्यान दिया है। सिर्फ राम के बारे में झूठी हवा-हवाई बातें करके उनके अस्तित्व पर सावल खड़े किए। अब जाकर प्रभु श्री राम को न्याय मिला और उन्हें अपने घर का अधिकार वापस मिला।
न्याय के पैरोकार, जिन्होंने न्याय को बना दिया एक मजाक!

सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं और यही हुआ राम मंदिर के साथ भी। न्याय मिला, पर न्याय में रोड़े अटकाने वाले लोगों की कमी नहीं थी।

कपिल सिब्बल – सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि मामले की दैनिक सुनवाई को रोकने की कोशिश करते हुए इन्होंने कहा था कि कि इस फैसले से 2019 के चुनाव प्रभावित होंगे, इसीलिए इस फैसले में तब तक देरी हो जानी चाहिए।

राजीव धवन – यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का प्रतिनिधित्व करते हुए राजीव धवन ने भगवान राम के ‘जन्मस्थान’  पर कई सवाल खड़े किए थे और अतार्किक बातों पर जिरह कर रहे थे।

जफरयाब जिलानी – उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील जिन्होंने श्री राम जन्मभूमि के खिलाफ केस लड़ा था। जफरयाब जिलानी ने कहा था कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं।

त्रेता युग में मंथरा ने भगवान राम को अयोध्या से निर्वासित करने का षड़यंत्र तो रचा, पर पहले से ही निर्धारित रावण संहार के बाद प्रभु राम अयोध्या वापस विराजे। ठीक वैसे ही कलयुग के मंथराओं ने राम मंदिर के निर्माण में असंख्य संकट-रोड़े पैदा किए। प्रभु राम की कृपा से इन राम विरोधियों का सच भी सामने आया और आज भगवान राम के भव्य मंदिर का शिलान्यास हो रहा है।

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