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पहले राम मंदिर था एक किस्सा, अब है हकीकत का हिस्सा

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राम मंदिर का सपना जल्द ही पूरा होने वाला है। कुछ ही महीनों में भव्य राम मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा, लेकिन हिंदुओं की आस्था के प्रतीक भगवान राम की जन्मभूमि, उनके अस्तित्व और करोड़ों लोगों की आस्था से सैकड़ों साल तक जो खिलवाड़ हुआ, उसे भुलाया नहीं जा सकता। 5 फरवरी 2019 को भी भुलाया नहीं जा सकता जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में एक ट्रस्ट का जिक्र किया था। उन्‍होंने बताया था कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बना दिया गया है। इस ट्रस्ट का नाम श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र होगा। यह स्वतंत्र होगा और भगवान राम के जन्मस्थान पर एक विशाल मंदिर के लिए सभी निर्णय लेने में सक्षम होगा।

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा गठित ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ की बुधवार को पहली बैठक हुई। अयोध्या के साधु-संतों और विहिप को उम्मीद थी कि ट्रस्ट का अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास बनाए जा सकते हैं और हुआ भी वही। रामजन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास को ट्रस्‍ट का अध्यक्ष-प्रबंधक की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

कौन हैं अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास

राममंदिर आंदोलन में जिन प्रमुख संतों ने अयोध्या में कोर्ट से लेकर सड़क तक संघर्ष किया था, उनमें दिगंबर अखाड़ा के महंत परमहंस रामचंद्र दास के बाद मणिरामदास छावनी के महंत नृत्यगोपाल दास प्रमुख हैं।

राम मंदिर आंदोलन में राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख महंत नृत्यगोपाल दास अहम किरदार निभाने वाले लोगों में शामिल रहे हैं। इसी के चलते अब उन्हें श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का अध्यक्ष-प्रबंधक का दायित्‍व सौंपा गया है।

महंत नृत्यगोपाल दास का जन्म 11 जून 1938 को बरसाना मथुरा के कहौला ग्राम में हुआ था। उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में ही वैराग्य धारण कर लिया और अयोध्या आ गए। उनके शिष्य राधेश्याम शास्त्री बताते हैं कि इसके बाद वे अयोध्या से काशी में संस्कृत की पढ़ाई करने गए। 1953 में पुन: अयोध्या आकर मणिरामदास की छावनी में रूके। वे महंत राममनोहर दास से दीक्षित थे।

जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए जन-जागरण के लिए सीतामढ़ी से अयोध्या पहुंची राम-जानकी रथ यात्रा मणिरामदास छावनी में ही रूकी थी। परमहंस कोर्ट में सक्रिय थे तो नृत्यगोपाल आंदोलन के संतों-महंतों व कारसवेकों के लिए साधन-सुविधाएं रात दिन एक उपलब्ध कराते थे।

फोटो- महंत नृत्यगोपाल दास

ट्रस्ट के सदस्य और दलित कारसेवक कामेश्वर चौपाल ने रखी थी पहली ईंट

राम मंदिर आंदोलन हमेशा से ही हिंदुत्व और हिंदू एकता की भावना के अनुरूप था और आज भी है, जिसका उदाहरण हैं ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के सदस्य और दलित कारसेवक कामेश्वर चौपाल। रोटी के साथ राम का नारा देने वाले चौपाल ने ही 9 नवंबर 1989 को राम मंदिर निर्माण के लिए हुए शिलान्यास कार्यक्रम में पहली ईंट रखी थी। उस समय वह पूरे देश में चर्चा कें केंद्र में थे।

थोड़े बदलाव के साथ पुराने नक्शे के आधार पर बनेगा मंदिर!

अयोध्या में भगवान राम का मंदिर विश्व हिंदू परिषद के मॉडल पर ही बनेगा। हालांकि, मॉडल में मंदिर की ऊंचाई के आधार पर कुछ बदलाव संभव है। ट्रस्ट के अध्यक्ष बने महंत नृत्य गोपाल दास ने बताया है कि राम मंदिर का मॉडल वही रहेगा, लेकिन उसे और ऊंचा व चौड़ा करने के लिए प्रारूप में थोड़ा बदलाव किया जाएगा। नृपेंद्र मिश्रा की अगुवाई में निर्माण समिति का गठन किया गया है।

भगवान विष्णु के पसंदीदा अष्टकोणीय आकार में होगा मंदिर

अयोध्या में जन्मभूमि पर श्रीराम लला का मंदिर गुजरात के वास्तुशिल्पी परिवार के वास्तुशिल्प विशेषज्ञ चंद्रकांत सोमपुरा के बनाए डिजाइन और मॉडल पर ही बनेगा। यह मॉडल भगवान विष्णु के पसंदीदा अष्टकोणीय आकार में होगा। नागर शैली में पूर्णतया पत्थरों से बनने वाले दो मंजिला मंदिर में पांच प्रखंड होंगे।

विहिप ने कई साल मंदिर निर्माण के लिए अलग-अलग नक्शों पर विचार किया और फिर एक नक्शा तैयार किया था। इस नक्शे को राम मंदिर का मूल स्वरूप माना जा रहा है। इस प्रस्तावित नक्शे के मुताबिक मंदिर 128 फीट ऊंचा, 140 फीट चौड़ा और 270 फीट लंबा होगा। इस दो मंजिला मंदिर में 212 स्तंभ होंगे। इसकी छत में एक शिखर होगा जिसे भव्यता को ध्यान में रखकर बनाया जाएगा।

इसका निर्माण पांच हिस्सों- गर्भगृह, कौली, रंग मंडप, नृत्य मंडप और सिंह द्वार में किया जाना है। मंदिर के मुख्य द्वार का निर्माण मकराना के सफेद संगमरमर से होगा। गर्भगृह के ठीक ऊपर 16.3 फीट के प्रकोष्ठ का निर्माण होगा, जिस पर 65.3 फीट ऊंचे शिखर का निर्माण होगा। रामलला की मूर्ति निचले स्तर पर ही विराजमान होगी। खास बात यह है कि मंदिर में लोहे का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। पूरे मंदिर के निर्माण में करीब 1.75 लाख घन फुट पत्थर की आवश्यकता होगी।

1989 से शुरू हो गई थी पत्थरों पर नक्काशी

राम मंदिर पर आखिरी फैसला तो 2019 में आया, पर मंदिर निर्माण के लिए द्वार और स्तंभों की नक्काशी कई साल से चल रही है। अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि न्यास की कार्यशाला में 1989 से ही तराशे जा रहे शिल्पकला के अद्भुत नमूनों और पूरे देशभर से पूजित होकर अयोध्या पहुंचीं श्रीराम शिलाओं का भी उपयोग मंदिर निर्माण में होगा।

हालांकि, गर्भगृह का निर्माण अभी होना है, जहां मूर्ति की पूजा की जाएगी। खबरों के मुताबिक स्तंभ तैयार हैं, लेकिन गर्भगृह की तैयारी अभी नहीं हुई है। अभी तक 106 स्तंभ बनकर तैयार हो चुके हैं और 106 स्तंभों की नक्काशी अभी होनी है। पत्थरों का काम 1989 में ही शुरू हो चुका था और इसलिए इसमें बहुत सारा काम पहले ही हो चुका है।

मोदी-योगी के कार्यकाल में ही पूरा होगा राम मंदिर निर्माण कार्य, संभावित वर्ष 2022

मंदिर बनने की समय सीमा के बारे में नृत्यगोपाल दास ने दावा किया है कि मोदी और योगी के कार्यकाल में ही राम मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा। उन्होंने कहा है कि मोदी-योगी राज में राम मंदिर नहीं बनेगा तो कब बनेगा।

फिलहाल 14x21 आकार के बुलेटप्रूफ मंदिर में रहेंगे रामलला

मंदिर निर्माण से पहले रामलला को दूसरे मंदिर में रखा जाएगा। मूल गर्भ गृह से करीब डेढ़ सौ मीटर दूरी पर स्थित मानस भवन के नजदीक अस्थायी मंदिर बनाया जाएगा, जहां रामलला फिलहाल विराजमान होंगे। 14×21 साइज का अस्थायी मंदिर जर्मन पाइन से बनेगा, जो बुलेटप्रूफ होगा।

यूपी के बजट में रामनगरी के लिए पिटारा खुला

योगी सरकार ने अपने चौथे बजट में रामनगरी के विकास के लिए खजाना खोल दिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर के विकसित किए जा रहे श्रीरामचंद्र एयरपोर्ट के लिए जमीन खरीद को 500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। जबकि राम मंदिर बनने के साथ उच्चस्तरीय पर्यटन सुविधाओं पर 85 करोड़ रुपये खर्च होंगे। साथ ही अयोध्या में नौ हैरिटेज होटल समेत रेस्टोरेंट खोलने में उत्तर-प्रदेश पर्यटन नीति के तहत 50 करोड़ के प्रावधान से अब तेजी आने की उम्मीद है। बीते दिनों अयोध्या पहुंचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तुलसी स्मारक भवन को हाईटेक करने की घोषणा की थी। बजट में इसके लिए भी अलग से 10 करोड़ रुपये दिए गए हैं।

राम मंदिर की राह में डाली गईं खूब अड़चनें

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला के हक में निर्णय सुनाया और सैकड़ों साल पुराने मामले का पटाक्षेप कर दिया। राम मंदिर निर्माण की राह में बेशुमार अड़चनें डाली गईं। जब सुप्रीम कोर्ट ने फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला निपटाने के लिए कहा तब राम मंदिर के रास्ते में खूब दांव-पेंच,रोड़े, अड़ंगे डाले गए।

रोजाना सुनवाई पर बनी थी बात

मध्यस्थता के जरिए विवाद का कोई हल निकालने का प्रयास असफल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की रोजाना सुनवाई करने का फैसला किया था। 1 अगस्त 2019 को मध्यस्थता समिति ने सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद लिफाफे में फाइनल रिपोर्ट पेश की थी और सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट के हवाले से बताया कि मध्यस्थता समिति के जरिए मामले का कोई हल नहीं निकाला जा सका। मामले की सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ में जस्टिस एस. ए. बोबडे, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. ए. नजीर भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए सप्‍ताह के पांचों दिन अयोध्‍या जमीन विवाद मामले की सुनवाई की।

मुस्लिम पक्ष के वकील ‘लंबे वक्त’ तक चलाना चाहते थे केस

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने मामले में पांच दिन सुनवाई किए जाने पर आपत्ति जताई थी। राजीव धवन का कहना था कि यह सिर्फ एक हफ्ते भर का मामला नहीं है, बल्कि लंबे समय तक चलने वाला मामला है। धवन ने कहा था कि हमें दिन रात अनुवाद के कागज पढ़ने और अन्य तैयारियां करनी पड़ती हैं। साथ ही राजीव धवन ने कहा था कि इस मामले में इतनी तेज सुनवाई नहीं होनी चाहिए।

कपिल सिब्बल और राजीव धवन पहले भी डाल चुके थे अड़ंगा

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर मामले की सुनवाई जुलाई 2019 तक यानी लोकसभा चुनाव 2019 के बाद तक टालने की अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट में सुन्नी वक्फ बोर्ड का पक्ष रखते हुए कपिल सिब्बल ने दलील दी थी कि राम मंदिर मामले की सुनवाई को जुलाई 2019 तक टाल दिया जाए, क्योंकि मामला राजनीतिक हो चुका है। कपिल सिब्बल और मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन की ओर से कोर्ट में दलील दी गई थी कि इस मामले की जल्द सुनवाई सुब्रमण्यम स्वामी की अपील के बाद शुरू हुई, जो कि इस मामले में कोई पार्टी भी नहीं हैं। सिब्बल ने कहा था कि कोर्ट को देश में गलत संदेश नहीं भेजना चाहिए, बल्कि एक बड़ी बेंच के साथ मामले की सुनवाई करनी चाहिए।

आखिरकार तमाम अड़ंगों-अड़चनों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरसे से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे रामलला को इंसाफ दिलाकर ऐतिहासिक फैसला दिया और अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अमल कराने में मोदी सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही। कुछ ही महीनों में हिंदुओं के आस्था के प्रतीक भगवान राम का भव्य मंदिर कोई किस्सा नहीं,बल्कि हकीकत का एक हिस्सा होगा।

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