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राम मंदिर और सोमनाथ मंदिर पर नेहरू की आपत्ति के कारण!

ram mandir

हिंदुओं के आराध्य भगवान राम का मंदिर बनने जा रहा है। 5 अगस्त को मंदिर का शिलान्यास किया जाना है। दशकों तक राम मंदिर के नाम पर देश में राजनीति की जा रही था, जिसका पटाक्षेप हो गया और राम मंदिर अस्तित्व में आया।

मंदिर के शिलान्यास से पहले राजनीति का दौर फिर से शुरू हो चुका है। इतिहास के आइने में झांककर देखते हैं कि राम मंदिर के साथ-साथ सोमनाथ मंदिर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का क्या रवैया था।

आजादी के बाद से ही पंडित नेहरु का अयोध्या पर सख्त रुख!

अयोध्या में जिस ताले को पूर्व पीएम राजीव गांधी ने खुलवाया था, वह ताला लगाया गया था, नेहरूजी के जमाने में। अयोध्या में भगवान राम और अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां हटवाने के लिए नेहरू ने पूरा जोर लगा दिया था।

26 दिसंबर 1949 को नेहरू ने पंत को टेलीग्राम किया, ‘‘मैं अयोध्या के घटनाक्रम से चिंतित हूं। मैं उम्मीद करता हूं कि आप जल्दी से जल्दी इस मामले में खुद दखल देंगे।’’

उसके बाद 7 जनवरी 1950 को नेहरू जी ने भारत के गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को पत्र लिखा: ‘‘मैंने पिछली रात पंत जी को अयोध्या के बारे में लिखा और यह पत्र एक आदमी के हाथ से लखनऊ भेजा। बाद में पंडित जी ने मुझे फोन किया। उन्होंने कहा कि वह बहुत चिंतित हैं और वह खुद इस मामले को देख रहे हैं। वह कार्यवाही करना चाहते हैं, लेकिन वह चाहते थे कि कोई प्रतिष्ठित हिंदू पूरे मामले को अयोध्या के लोगों को समझा दे। मैंने उनको आपके पत्र के बारे में बता दिया, जो आपने मुझे सुबह भेजा है। वल्लभभाई भी कल पंत जी की निवेदन पर लखनऊ जा रहे हैं। वह संसद के चुनावों के सिलसिले में वहां जा रहे हैं।’’

कश्मीर के लिए अयोध्या पर दांव!

दरअसल, उस समय भारत और पाकिस्तान कश्मीर को लेकर नेहरू भारी तनाव में थे। भारत करीब डेढ़ साल की लड़ाई के बाद कश्मीर से कबायलियों को खदेड़ चुका था। इस बीच शेख अब्दुल्ला आजाद कश्मीर की बातें करने लगे थे। नेहरूजी पूरा जोर लगा रहे थे कि किसी तरह कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम समुदाय को भारत से जोड़कर रखा जाए, ताकि किसी भी सूरत में कश्मीर भारत में बना रहे।

5 फरवरी 1950 को नेहरू जी ने फिर पंतजी को पत्र लिखा: ‘‘मुझे बहुत खुशी होगी, अगर आप मुझे अयोध्या के हालात के बारे में सूचना देते रहें। आप जानते ही हैं कि इस मामले से पूरे भारत और खासकर कश्मीर में जो असर पैदा होगा, उसको लेकर मैं बहुत चिंतित हूं। मैंने आपको सुझाव दिया था कि अगर जरूरत पड़े तो मैं अयोध्या चला जाऊंगा। अगर आपको लगता है कि मुझे जाना चाहिए तो मैं तारीख तय करूं। हालांकि मैं बुरी तरह व्यस्त हूं।’’

फैजाबाद के डीएम ने नेहरू को अयोध्या आने की अनुमति नहीं दी

1949 में तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रांत) के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से फौरन मूर्तियां हटवाने को कहा। उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटवाने का आदेश दिया, लेकिन ज़िला मजिस्ट्रेट केके नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई।”

“जब नेहरू ने दोबारा मूर्तियां हटाने को कहा तो नायर ने सरकार को लिखा कि मूर्तियां हटाने से पहले मुझे हटाया जाए। देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए सरकार पीछे हट गई।

नेहरू ने अयोध्या आने के लिए पंत से कहा, पर फैजाबाद के डीएम केके नायर ने सुरक्षा कारणों से प्रधानमंत्री को आने की अनुमति नहीं दी।

सोमनाथ मंदिर पर भी सख्त थे नेहरू!

सोमनाथ मंदिर को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की नाराजगी जगजाहिर है। गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर को 12 ज्योर्तिलिंगों में सबसे पहला माना जाता है, मंदिर में लगा वाणस्तम्भ बताता है कि उस जगह से अंटाकर्टिका तक सीधा समुद्र है, कोई जमीन नहीं है। ये मंदिर कितना पुराना है कोई नहीं जानता, लेकिन ये मंदिर प्रतीक है बर्बरता और लूटमार की यादों का, हर सदी में इसे हमलावरों ने लूटा। पहले हमला सिंध के गर्वनर अल जुनैद ने सातवीं शताब्दी में किया, उसके बाद कई बार महमूद गजनबी ने लूटा। उसके बाद अलाउद्दीन खिलजी के सिपहसालार उलूग खान से लेकर औरंगजेब तक ने इस मंदिर को लूटा और ध्वस्त किया।

साल 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को नष्ट कर दिया था। कहा जाता है कि अरब यात्री अल-बरुनी के अपने यात्रा वृतान्त में मंदिर का उल्लेख देख गजनवी ने करीब 5 हजार साथियों के साथ इस मंदिर पर हमला कर दिया था।

इस हमले में गजनवी ने मंदिर की संपत्ति लूटी और हमले में हजारों लोग भी मारे गए थे। इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया।

सरदार पटेल की पहल पर हुआ सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार

कभी अपनी संपदा और ऐश्वर्य के लिए ख़्यात सोमनाथ मंदिर में जब 1947 में सरदार पटेल पहुंचे तो इसकी हालत देखकर उन्हें बहुत निराशा हुई। इसके बाद उन्होंने सोमनाथ के जीर्णोद्धार का निर्णय लिया और अपने सहयोगी केएम मुंशी को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी। 1951 में जब मंदिर का पुननिर्माण पूरा हुआ तो खुद सरदार वल्लभभाई पटेल इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने के लिए मौजूद नहीं थे।

नेहरु ने सोमनाथ मंदिर से दूरी बनाए रखी

राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को मंदिर के उद्घाटन करने का न्योता दिया गया और उन्होंने इसे स्वीकार भी कर लिया, लेकिन जवाहरलाल नेहरू को यह पसंद नहीं आया।

नेहरू ने खुद को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार से पूरी तरह अलग रखा था। नेहरू ने सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखकर सोमनाथ मंदिर परियोजना के लिए सरकारी फंड का इस्तेमाल नहीं करने का निर्देश दिया था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की राय

डॉ. राजेंद्र प्रसाद  की राय थी कि सभी धर्मों को बराबरी और आदर का दर्जा दिया जाना चाहिए।

राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ में कहा मैं एक हिंदू हूं, लेकिन सारे धर्मों का आदर करता हूं. कई मौकों पर चर्च, मस्जिद, दरगाह और गुरुद्वारा भी जाता रहता हूं‘.

प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण हेतु ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विरोध के बावजूद स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी स्वीकृति दी थी और वह 11 मई, 1951 को वहां गए भी। भारत के स्वतंत्र होने के साथ ही भारत के सांस्कृतिक गौरव चिन्हों को पुर्नस्थापित करना और करोड़ों लोगों की श्रद्धा के ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को लेकर राष्ट्रीय दृष्टि कैसी होनी चाहिए, इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण डॉ. राजेंद्र प्रसाद का उक्त अवसर पर दिया गया भाषण है।

महात्मा गांधी जी के ‘रामराज्य’ का स्वप्न जिन राजा रामचंद्र के कारण था उनकी जन्मस्थली पर उनके मंदिर को ध्वस्त करने के अपमान को निरस्त कर उनका भव्य मंदिर वहीं बनाने के संकल्प को राष्ट्रीय दृष्टि से कैसे देखना चाहिए, यह भी उनके भाषण से स्पष्ट होता है।

राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के भाषण का अंश

‘हमारे शास्त्र में श्री सोमनाथ जी को 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना गया है और इसलिए पुरातन काल में भारत की समृद्धि, श्रद्धा और संस्कति का प्रतीक भगवान सोमनाथ का यह मंदिर था। दूर-दूर तक और देश-देश में इसके अतुलनीय वैभव की ख्याति फैली हुई थी, किंतु जातीय श्रद्धा का बाह्य प्रतीक चाहे विध्वंस किया जा सके पर उसका स्नोत तो कभी नहीं टूट सकता। यही कारण है कि सब विपत्तियां पड़ने पर भी भारत के लोगों के हृदय में भगवान सोमनाथ के इस मंदिर के प्रति श्रद्धा बनी रही और उनका यह स्वप्न बराबर रहा कि वे इस मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा पुन: कर दें। समय-समय पर वे ऐसा करते भी रहे और आज ऐतिहासिक मंदिर के जीर्णोद्धार के पश्चात इसके प्रांगण में भारत के कोने-कोने से आए हुए अनेक नर-नारियों का कलरव फिर सुनवाई दे रहा है।

मैं समझता हूं कि भगवान सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण उसी दिन पूरा होगा जिस दिन न केवल इस प्रस्तर की बुनियाद पर भव्य भवन खड़ा हो गया होगा, वरन भारत की उस समृद्धि का भी भवन तैयार हो गया होगा जिसका प्रतीक पुरातन सोमनाथ का मंदिर था। इसके साथ ही मेरी समझ से सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक भी पूरा नहीं होगा जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊंचा न हो जाए कि यदि कोई वर्तमान अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे तो हमारी संस्कृति के बारे में आज की दुनिया में वही भाव प्रकट करे। नव निर्माण का यह यज्ञ स्वर्गीय वल्लभ भाई पटेल ने आरंभ किया था।

भारत की विच्छिन्नता को पुन: एक और अखंड करने में उनका निर्णायक हाथ था। उनके हृदय में यह आकांक्षा उत्पन्न हुई थी कि नव निर्माण के प्रतीक स्वरूप भारत की पुरातन श्रद्धा का यह प्रतीक फिर से निर्मित किया जाए। वह स्वप्न भगवान की कृपा से आज एक सीमा तक पूरा हो गया, किंतु वह पूर्णरूपेण उसी समय पूरा हो सकेगा जब भारत के जनजीवन का वैसा ही सुंदर मंदिर बन गया होगा जैसा यह मंदिर है। जय भारत।’

जवाहर लाल नेहरु ने इस भाषण को सरकारी रिकॉर्ड में नहीं रखा!

आखिर इस भाषण में ऐसा आपत्तिजनक क्या था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी ने इसको सरकारी रिकॉर्ड में नहीं लेने दिया। यह भारतीय अवधारणा और अभारतीय अवधारणा के बीच संघर्ष का उदाहरण है।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने खुद को सेकुलर बताकर मंदिरों से दूरी बनाई, पर आजादी के साथ ही भारत के वामपंथी नेहरूजी की आड़ में हर अभारतीय अवधारणा को समाज और जीवन के हर क्षेत्र में थोपने का प्रयास करते रहे। इस कारण भारत का ‘भारतत्व’ पूर्ण पुरुषार्थ के साथ प्रकट नहीं हो सका।

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