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क्या त्याग पत्र में राहुल गांधी ने देश की जनता का अपमान किया ?

Rahul Gandhi Resignation

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है। ट्विटर पर एक खुला खत लिखकर राहुल गांधी ने साफ कर दिया कि वो अब कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं हैं और पार्टी को नए अध्यक्ष की तलाश करनी पड़ेगी। चार पन्नों में लिखे त्याग पत्र में राहुल गांधी ने जितनी बातें लिखी हैं उससे ये साफ है कि अभी भी न राहुल गांधी और न ही कांग्रेस ईमानदारी से अपनी हार की समीक्षा कर पा रहे हैं उल्टा वो संविधान, लोकतंत्र, देश की जनता का मजाक बना रहे हैं, उनका अपमान कर रहे हैं। आइए राहुल गांधी के त्याग पत्र का एक संक्षिप्त विश्लेषण करते हैं।

राहुल ने लिखा है कि मैंने प्रधानमंत्री, संघ और उनके द्वारा हथिया लिए गए संस्थानों से पूरी ताकत से अकेले लड़ाई लड़ी। मैं लड़ा, क्योंकि मैं भारत को प्यार करता हूं।

सच्चाई ये है कि

राहुल और उनकी पार्टी ने एक लोकतांत्रिक देश में चुनाव लड़ा और उनकी पार्टी को देश ने नकार दिया। देश ने कांग्रेस की नीयत और नीतियों को हराया। संवैधानिक संस्थान देश के हैं किसी पार्टी विशेष के नहीं और अगर ऐसा हो सकता तो कांग्रेस क्यों अपने हाथों से सत्ता जाने देती? और तो और राहुल गाँधी के हथियानाशब्द से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि देश में चुनाव हुए ही नहीं थे बल्कि प्रधानमंत्री मोदी बिना चुनाव के ही फिर से प्रधानमंत्री बन गए।

स्वतंत्र और साफ चुनाव के लिए देश के संस्थानों का निष्पक्ष होना जरूरी है। चुनाव स्वतंत्र मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका, पारदर्शी चुनाव आयोग के बिना संभव नहीं है। एक चुनाव का पारदर्शी होना तब भी संभव नहीं है, जब एक पार्टी का वित्तीय संसाधनों पर एकाधिकार हो। हमने 2019 में किसी राजनीतिक दल से लड़ाई नहीं लड़ी। हमने पूरे देश की मशीनरी, संस्थानों से लड़ाई लड़ी, जिन्हें विपक्ष के खिलाफ खड़ा कर दिया गया था। यह अब पूरी तरह साफ है कि देश के संस्थानों में अब वह निष्पक्षता नहीं रही, जो कभी भारत में थी।

सच्चाई ये है कि

साफ जाहिर है कि राहुल गांधी अपनी और कांग्रेस पार्टी की हार को पचा नहीं पा रहे हैं। सच्चाई स्वीकार करने के बजाय देश के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के साथ जनता के विवेक पर भी आघात कर रहे हैं। अव्वल तो राहुल गांधी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि कांग्रेस की नीतियां जनता सिरे से नकार चुकी है, लेकिन वो अपनी हार और हताशा मढ़ रहे हैं मीडिया, न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर।

इसका मतलब ये हुआ कि जब तक कांग्रेस जीतती रही तब तक सभी संस्थान सही थे बस हारना प्रारम्भ होते ही सभी संस्थान गलत हो गए। क्या राहुल गांधी भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपनी पार्टी द्वारा लाये गए महाभियोग को भी भूल गए, जिसमें उनकी पार्टी की बहुत किरकरी हुई थी।

हाल ही में मीडिया रिपोर्टों में ये खुलासा हुआ है कि लंदन में जिस तथाकथित  मीडिया हाउस ने इवीएम में गड़बड़ी और नोटबंदी के बाद बीजेपी नेताओं द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग की खबर जारी की थी और कांग्रेस ने उसके आधार पर बीजेपी और मोदी को बदनाम करने के लिए बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की थी वो अब कामुक मसाज सेंटर में बदल गया। कहने का मतलब ये कि अपने द्वारा गढ़े कथित मीडिया को ढाल बनाकर इन्होंने मीडिया को भी एक तरह से बदनाम किया है और फिर मीडिया की स्वतंत्रता की भी दुहाई दे रहे हैं।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में चुनाव आयोग हमेशा से स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए मिसाल बन चुका है और राहुल गांधी को अब इनमें खोट नजर आती है, ये संवैधानिक संस्था इन्हें बंधक नजर आने लगे हैं।

राहुल लिखते हैं कि देश को लेकर संघ का मकसद, देश के संस्थागत ढांचे को हथियाना अब पूरा हो गया है। हमारा लोकतंत्र संवैधानिक तौर पर कमजोर हो गया है। चुनाव अब देश का निर्धारण करने की जगह, महज रिवाज बन गए हैं।

सच्चाई ये है कि

एक स्वस्थ लोकतंत्र में चुनाव होता है, दलों की आपस में लड़ाई होती है, जिसकी विचारधारा और कार्य जनता को पसंद आती हैं जनता उन्हें चुनती है और राहुल गांधी ये कहकर कि संस्थागत ढांचे को हथियाना और चुनाव का रिवाज होना जनता का सीधा-सीधा अपमान है। क्या राहुल गांधी देश की जनता को मूर्ख समझते हैं? क्या राहुल गांधी को देश की जनता के विवेक पर भरोसा नहीं है? या राहुल गांधी ये समझते हैं कि कांग्रेस को वोट देने वाली जनता ही समझदार है बाकी बेवकूफ। इस तरह तो राहुल गांधी देश की करीब 45 प्रतिशत जनता को मूर्ख समझ रहे हैं?

जहां तक संस्थाओं के अधिग्रहण और जनादेश की बात है तो राहुल गांधी शायद इमरजेंसी को भूल गए हैं कि कैसे उन्हीं की दादी ने पूरे देश को एक जेल बना दिया था। संवैधानिक संस्थाओं को कठपुतली की तरह इस्तेमाल कर रही थीं, पर इमरजेंसी के बाद आम चुनावों में क्या हुआ? संवैधानिक संस्थाओं के लाख अधिग्रहण के बावजूद जनता ने कांग्रेस को बुरी तरह उखाड़ फेंका। जनता राजनेताओं से कहीं बेहतर देश के नफे-नुकसान को समझती है इसलिए जनादेश का अपमान करना, जनता को अविवेकशील समझना स्वयं में एक नादानी है।

राहुल आगे लिखते हैं कि सत्ता को हथियाने का यह काम कई चरणों पर हिंसा और भारत को मिल रहे दर्द के रूप में दिखाई दे रहा है। किसान, बेरोजगार युवा, महिलाएं, आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा कष्ट भोगेंगे। हमारी अर्थव्यवस्था और देश की गरिमा नष्ट हो जाएगी।

सच्चाई ये है कि

कांग्रेस और राहुल गांधी ये समझ ही नहीं पा रहे कि उन्हें करना क्या चाहिए। डर, भय, सांप्रदायिकता न जाने किन-किन शस्त्रों से कांग्रेस ने जनता को डराने का प्रपंच किया। 2014 फिर 2019 वही राग कि बीजेपी ऐसी है मोदी के आने से ऐसा हो जाएगा, पर ये भूल गए कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में देश में कोई भी बड़ी सांप्रदायिक घटना नहीं हुई, छिटपुट घटनाएं हुईं भी तो उसके पीछे भी राजनीतिक रंग चढ़ा मिला। अल्पसंख्यक, गरीब, किसान, वंचित जिसे कांग्रेस और राहुल गांधी डराने की कोशिश में अब भी जुटे हैं वो अपना भविष्य समझ रही है और मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल इसकी तस्दीक भी करता है, पर राहुल गांधी अभी इस झूठे नैरेटिव से बाहर नहीं निकल पाए हैं। राहुल गांधी का किसानो को लेकर रचा गया प्रपंच मध्य प्रदेश के मंदसौर में बुरी तरह से विफल रहा।

निष्कर्ष

राहुल गांधी के त्याग पत्र में त्याग कम, देश की जनता, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं का तिरस्कार ज्यादा नज़र आ रहा है। राहुल गांधी अपने त्याग पत्र में क्रिकेट खेल रहे उन बच्चों की तरह बात कर रहे हैं जो आउट होने के बाद भी खुद को आउट न मानकर अंपायर को ही दोष देने लगते हैं।

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