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भारत के वो गुमनाम 12 आयुष विशेषज्ञ, जिन्हें अब मिला सम्मान

ayush specialist

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को दिल्‍ली में एक कार्यक्रम के दौरान 10 आयुष सेंटरों का शुभारंभ किया साथ ही पीएम मोदी ने आयुष क्षेत्र से जुड़ी 12 विस्मृत हस्तियों के सम्‍मान में डाक टिकट जारी किए।

आयुष पद्धति को समृद्ध करने वाली जिन 12 हस्तियों के सम्मान में डाक टिकट भी जारी हुए हैं, उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों के उपचार में लगा दिया। किसी ने योग को माध्यम बनाया तो किसी ने आयुर्वेद को, किसी ने यूनानी से सेवा की तो किसी ने होम्योपैथी से। इस लेख में उन 12 गुमनाम आयुष विशेषज्ञों के बारे में जानकारी दी जा रही है।

राजवैद्य बृहस्पति देव त्रिगुण

राजवैद्य बृहस्पति देव त्रिगुण एक आयुर्वेदिक चिकित्सक थे। वो नाड़ी निदान के विशेषज्ञ और नाड़ी निदान के आयुर्वेदिक विशेषज्ञ थे। राजवैद्य बृहस्पति देव त्रिगुण ने महाऋषि आयुर्वेद के विकास के लिए महर्षि महेश योगी और अन्य आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के साथ सहयोग किया। उन्होंने विश्व के विभिन्न हिस्सों में यात्राएं की और यूरोप में उन्होंने अपने आयुर्वेदिक क्लीनिक खोले। अपनी अमेरिका यात्रा में उन्होंने यूसीएलए, हार्वर्ड और जॉन्स हॉप्किन्स जैसे चिकित्सा संस्थानों में आयुर्वेद पर संभाषण किया।

वैद्य शास्त्री शंकर दाजी पदे

वैद्य शास्त्री शंकर दाजी पदे को आयुर्वेद में उनके प्रचुर लेखन कौशल, विद्वता, गहरी सोच और तकनीकी दक्षता के लिए जाना जाता है। उन्होंने आयुर्वेद की ताकत और रहस्यों से लोगों को अवगत कराने के लिए आयुर्वेद विद्यालय की दूरदर्शिता दिखाई थी।

हकीम मुहम्मद कबीरउद्दीन

13 अप्रैल 1894 को बिहार के शेख़पुरा में पैदा हुए हकीम मुहम्मद कबीरउद्दीन का शुमार भारत के उन चुनिंदा हकीमों में होता है, जिन्होंने देश में न सिर्फ़ यूनानी चिकित्सा पद्धति को ज़िंदा किया बल्कि उसे एक नया रुप दे कर स्थापित भी किया। हकीम कबीरउद्दीन के पिता का नाम शेख़ जमीलउद्दीन था। पारंभिक शिक्षा शेख़पुरा में ही हासिल करने के बाद 1905 में हकीम मुहम्मद कबीरउद्दीन अपने भाई हकीम ज़हुरउद्दीन के साथ 11 साल की उम्र में कानपुर आ गए।  यहीं मौलाना अब्दुल्लाह कानपुरी और मौलाना अहमद हसन कानपुरी से दो साल तक अरबी और फ़ारसी की तालीम हासिल की। आधुनिक युग में भी यूनानी चिकित्सा पद्धति का महत्व भारत में बरकरार है तो इसका श्रेय हकीम मुहम्मद कबीरउद्दीन को जाता है, क्योंकि अगर वो अरबी और फ़ारसी ज़ुबान में मौजूद यूनानी चिकित्सा पद्धति की किताबों को उर्दू में अनुवाद नहीं करते तो अरबी और फ़ारसी ज़ुबान की तरह विश्व की ये सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति भी भारत से विलुप्त हो जाती।

वैद्य भास्कर विश्वनाथ गोखले

एक कुशल दूरदर्शी आयुर्वेद शिक्षक, प्रख्यात आयुर्वेद चिकित्सक, एक क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी  और दार्शनिक, ये सभी शब्द उस व्यक्तित्व का वर्णन करने के लिए कम हैं, जिनका नाम है वैद्य भास्कर विश्वनाथ गोखले उर्फ मामा गोखलेजी। 19 अप्रैल 1903 को कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में जन्मे और 12 जनवरी 1962 में दुनिया को अलविदा कहने वाले मामा गोखले को सिर्फ 62 साल का जीवनकाल मिला, लेकिन इस कम समय में उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है वह अद्वितीय है। आयुर्वेदिक शिक्षा की बेहतरी के लिए उनके पास मजबूत सिद्धांत थे।

उन्होंने 1928 में तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ से ‘आयुर्वेद विशारद’ की डिग्री पूरी की। अपनी डिग्री पूरी होने के बाद  उन्होंने फिर से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने 1937 में अपनी स्नातकोत्तर डिग्री आयुर्वेद पारंगत पूरी की। वो भारत में इस डिग्री से सम्मानित होने वाले पहले व्यक्ति थे। 1942 में उन्होंने एक बार फिर ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया और 2 साल के लिए फिर से जेल में डाल दिए गए। वैद्य पुरुषोत्तम शास्त्री ननाल की मृत्यु के बाद उन्होंने ताराचंद रामनाथ अस्पताल पुणे के मुख्य चिकित्सक के रूप में कार्य किया। 1946 में उन्हें तिलक आयुर्वेद के प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था।

वह सच्चे अर्थों में एक वैज्ञानिक थे। उनका एकीकृत चिकित्सा में मजबूत विश्वास था, लेकिन शास्त्री आधार पर। उनकी विचारदृष्टि रोगी को सर्वोत्तम संभव चिकित्सा देने की थी। वो भविष्य में आयुर्वेद वैज्ञानिक बनाने की दृष्टि रखते थे।

वैद्यभूषणम के राघवन थिरुमुलपाद

वैद्यभूषणम के राघवन थिरुमुलपाद केरल के एक आयुर्वेदिक विद्वान और चिकित्सक थे। उनका जन्म 20 मई 1920 को केरल के अलाप्पुझा जिले के चिंगोली में हुआ था। 21 नवंबर 2010 को 90 साल की उम्र में चालाकुडी स्थित आवास पर उनका निधन हो गया। तिरुमुलपाद ने विभिन्न शिक्षकों के सानिध्य में संस्कृत, थारकम (भारतीय दर्शन), ज्योतिषम (भारतीय ज्योतिष) और व्याकरण (व्याकरण) का अध्ययन किया। उन्होंने पी वासुदेवन नंबिसन के मार्गदर्शन में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की जिसे वैद्यभूषणम कहा जाता है। बचपन से ही वह गांधीवादी विचार और रहन-सहन के प्रति आकर्षित थे और खादी का उपयोग और प्रचार करना शुरू कर दिया था।

डॉ. के.जी. सक्सेना

डॉ. के.जी. सक्सेना का जन्म 25 सितंबर 1912 को पुरानी दिल्ली स्थित उनके पैतृक घर में हुआ था। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा अंबाला और कराची में हुई।  इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने कलकत्ता होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया और 1973 में अपनी पढ़ाई पूरी की। 5 मार्च 1937 को उनका विवाह शकुंतला देवी से हुआ।

डॉ. के जी सक्सेना एक प्रख्यात होम्योपैथिक चिकित्सक थे। उन्होंने होम्योपैथी की मान्यता और उन्नति के लिए हर संभव प्रयास किए। वह भारत सरकार के पहले मानद सलाहकार (होम्योपैथी) थे। उन्होंने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के मानद चिकित्सक के रूप में भी कार्य किया था। उन्हें पदम श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

होम्योपैथी के विकास में उनके शानदार योगदान के लिए उन्हें एन सी चक्रवर्ती मेमोरियल कमेटी द्वारा कलकत्ता में राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। वह 1994 से 1999 तक दिल्ली सरकार की होम्योपैथिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष थे। डॉ. के.जी. सक्सेना का अक्टूबर 2003 में निधन हो गया था।

वैद्य यादवजी त्रिकमजी आचार्य

वैद्य यादवजी त्रिकमजी आयुर्वेद के अग्रदूतों में से एक थे। वैद्य यादवजी त्रिकमजी आचार्य का जन्म 1881 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उन्होंने आयुर्वेद और रस शास्त्र में कई पुस्तकों और पांडुलिपियों को लिखा और संपादित किया है। इसके साथ ही वह एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शिक्षाविद और प्रशासक थे। उन्होंने 1951 में रसमृतम् नामक ग्रन्थ का लेखन किया, जिसे मोतीलाल बनारसी दास ने प्रकाशित किया था।

वह गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले डॉ. पी. एन. मेहता के सबसे बड़े मददगार थे। आचार्य यादवजी ने गुलाबकुंवर आयुर्वेद महाविद्यालय में शिक्षक, सलाहकार और प्रमुख के रूप में भी सेवा की। फलदायी और दूरगामी जीवन के बाद 1956 में उनका स्वर्गवास हो गया।

स्वामी कुवलयानन्द

स्वामी कुवलयानन्द योग पर वैज्ञानिक अनुसंधान के पुरोधा थे। योग और योग शिक्षा में वैज्ञानिक एवं उपचार संबंधी शोध के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए स्वामी कुवलयानंद का महत्वपूर्ण योगदान है। स्वामी कुवलयानंद का जन्म  गुजरात के दबोई गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने 1920 के दशक में योग पर वैज्ञानिक अनुसंधान प्रारम्भ किया और योग के अध्ययन के लिये 1924 में ‘योग मीमांसा’ नामक प्रथम वैज्ञानिक जर्नल प्रकाशित किया। 1924 में ही उन्होने कैवल्यधाम स्वास्थ्य एवं योग अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की जहां योग पर उनका अधिकांश अनुसंधान सम्पन्न हुआ। आधुनिक योग पर उनका अच्छा-खासा प्रभाव है।

हकीम मोहम्मद अब्दुल अजीज लखनवी

हकीम अब्दुल अज़ीज़ का जन्म लखनऊ में कश्मीरी प्रवासियों के परिवार में हुआ था। उन्हें यूनानी चिकित्सा पद्धति में लखनवी परंपरा का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने 1877 में चिकित्सा का अभ्यास करना शुरू किया। 1902 में उन्होंने यूनानी मेडिसिन में अनुसंधान और उत्कृष्टता के लिए लखनऊ में अल तिब्ब स्कूल की स्थापना की।

डॉ. दिनशॉ मेहता

डॉ. दिनेश मेहता महात्मा गांधी के प्रसिद्ध सहयोगी थे। 1930 में वे पहली बार महात्मा गांधी से मिले। उन्होंने पुणे में राष्ट्रीय प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान की स्थापना में महात्मा गांधी की मदद की। महात्मा गांधी ने 1944 में यहां 156 दिन बिताए थे। महात्मा गांधी ने उस वक्त अपील की, ‘मेरे 21 दिनों के उपवास और उसके बाद श्री दिनशॉ मेहता और उनके कर्मचारियों ने मेरी सबसे अच्छी सेवा की है। यह स्वैच्छिक श्रम था। मेरा मानना ​​है कि वह अपने पेशे के ईमानदार प्रेमी हैं। उन्हें प्राकृतिक चिकित्सा का जनून है।

महर्षि महेश योगी

महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास ही स्थित पांडुका गांव में हुआ। उनके पिता का नाम रामप्रसाद श्रीवास्तव था। महर्षि योगी ने भावातीत ध्यान के माध्यम से पूरी दुनिया को वैदिक वांग्मय की संपन्नता की सहज अनुभूति कराई। नालंदा व तक्षशिला के अकादमिक वैभव को साकार करते हुए विद्यालय, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय की सुपरंपरा को गति दी। महर्षि द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान एक विशिष्ठ व अनोखी शैली है, जो चेतना के निरंतर विकास को प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है।

तिरू टीवी संबाशिवम पिल्लई

तिरू टीवी संबाशिवम पिल्लई ने सिद्ध साइक्लोपीडिक चिकित्सा शब्दकोष लिखा, जिसके लिए उन्हें किंवदंती के रूप में सम्मानित किया जाता है। इस चिकित्सा शब्दकोष को सिद्ध प्रणाली के महान खजाने में से एक माना जाता है। न तो उनके पास बुनियादी चिकित्सा की डिग्री थी और न ही वे चिकित्सा पृष्ठभूमि वाले परिवार से थे, फिर भी सिद्ध प्रणाली में उनके ज्ञान की गहराई बहुत सराहनीय है। उन्होंने अपना पूरा जीवन सिद्ध प्रणाली के प्राचीन साहित्य को परिभाषित करने में लगा दिया।

आयुष के लिए खुद को खपा देने वाले उन गुमनाम विशेषज्ञों को पहली बार डाक टिकट जारी कर सम्मान देने का प्रयास किया गया है।

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