Explained Featured National

जनसंख्या प्रबंधन: भारत को आत्ममंथन की आवश्यकता

Population management India

11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस है। इस दिवस का उपयोग हम आत्ममंथन के लिए कर सकते हैं, कि क्या जिस गति से हमारी जनसंख्या बढ़ रही है, वह हमारे टिकाउ विकास के लिए उपयुक्त है? या हमें अब जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई ठोस उपाय करना चाहिए।

क्या हम चीन से भी आगे निकल जायेंगे?

भारत की जनसंख्या का अगला आधिकारिक आकड़ा 2021 में आएगा, लेकिन अन्य तरीकों से हमें बढ़ती जनसंख्या का ठीक ठीक अनुमान लग रहा है। हम कह सकते हैं कि हमारी जनसंख्या लगभग 135 करोड़ हो चुकी है। चीन ही हमसे आगे हैं, उसमें भी कहा जा रहा है कि वर्ष 2030 तक हम चीन को भी जनसंख्या के मामले में पीछे छोड़ देंगे। भारत से लगभग 5 गुणा बड़ी अर्थव्यवस्था वाला चीन यदि जनसंख्या को लेकर आज से 40 साल पहले सजग हो गया था। तो क्या हम अब भी इसे लेकर सतर्क नहीं हो सकते। चीन ने 1979 में एक परिवार एक बच्चे की नीति अपना ली थी।

वैसे पूरी दुनिया में दस ही ऐसे देश हैं जहां जनसंख्या अधिक है। इन देशों में चीन, भारत, अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, रूस और मैक्सिको है। उसमें भी चीन, भारत, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कुछ ही देश हैं जहां जनसंख्या विस्फोटक स्थिति में पहुंच चुकी है। पिछले कुछ वर्षों से भारत में जनसंख्या नियंत्रण पर बात तो हो रही है लेकिन अभी औपचारिक तौर पर किसी बड़ी नीति की घोषणा नहीं हुई है। अभी तक लोगों के विवेक और उनकी मर्जी पर ही इस विषय को छोड़ दिया गया है।

आइए देखते हैं कि दुनिया के बाकी देशों ने किस तरह अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण किया और कितने सफल हुए?

चीन

चीन में 1979 में ही जनसंख्या नियंत्रण पर राष्ट्रीय कानून लाया गया। चीन ने एक परिवार एक बच्चे की नीति अपनाई और उसे कड़ाई से लागू किया। अभी कुछ साल पहले तक यदि कोई दंपत्ति दूसरे बच्चे को जन्म देता था तो उस पर जबर्दस्त तरीके से जुर्माना लगाया जाता था और कुछ सुविधाओं से वंचित भी किया जाता था। चीन पहला ऐसा देश था जहां बलात तरीके से जनसंख्या पर नियंत्रण किया गया। यही नहीं चीन में विवाह की वैधानिक उम्र भी अन्य देशों की अपेक्षा ज्यादा कर दी गई। वहां लड़कों के लिए शादी की न्यूतम उम्र 22 वर्ष और लड़कियों के लिए 20 वर्ष है। चीन की इस सख्ती का परिणाम भी आया। लेकिन इस कठोर नियम का दुष्परिणाम यह हुआ कि चीन बूढ़ों का देश बनने लगा। 2014 में चीन ने एक परिवार एक बच्चे के नियम को खत्म कर दिया और एक परिवार में दो बच्चे के जन्म की छूट दे दी। कहा तो यह भी जा रहा है कि चीन अब दो बच्चे की सीमा को भी खत्म करने जा रहा है, क्योंकि वहां जन्म वृद्धि दर काफी नीचे आ गई है। हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 2018 में चीन में प्रति एक हजार की जनसंख्या पर केचल 10.94 बच्चों का जन्म हुआ।

मैक्सिको

मैक्सिको एक ऐसा देश हैं जहां 1933 से लेकर 1980 के दौरान जनसंख्या में जबर्दस्त वृद्धि हुई। 1950 में मैक्सिकों में जनसंख्या वृद्धि दर 4. 6 प्रतिशत थी तो 1970 में 7.2 प्रतिशत। लेकिन 1980-90 के दशक में मैक्सिकों की जनसंख्या वृद्धि दर में तेजी से गिरावट आई। यह 2 प्रतिशत पर आ गई। 1990 से 2004 के दौरान मैक्सिकों में जनसंख्या वृद्धि दर सिर्फ एक प्रतिशत थी। 2018 में मैक्सिको में प्रति 1000 की जनसंख्या पर 17.5 बच्चों का जन्म हुआ। ब्राजील भी एक ऐसा देश रहा है जहां जनसंख्या एक बड़ी समस्या थी। 1960 के दशक में ब्राजील में एक महिला के औसतन 6 बच्चे थे जो आज कम होकर सिर्फ 1.9 रह गए है।

इंडोनेशिया मॉडल

जनसंख्या नियंत्रण में इंडोनेशिया का सुहार्तो मॉडल बहुत सफल रहा है। सुहार्तो इंडोनेशिया के मिलिट्री शासक थे और बाद में वहां के राष्ट्रपति भी बने। सुहार्तो ने इंडोनेशिया में 30 साल तक शासन किया।सुहार्तो मॉडल के नाम से विख्यात इंडोनेशिया के जनंसख्या नियंत्रण कार्यक्रम ने वहां के समाज को बदल कर रख दिया। इंडोनेशिया एक मुस्लिम देश है और वहां भी मुस्लिम मौलानाओं ने जनसंख्या नियंत्रण के किसी भी कृत्रिम तरीके का विरोध किया। लेकिन इंडोनेशिया की सरकार ने तकरार के बजाय जनजागरण और लोगों, खास कर महिलाओं तक पहुंचने का कार्यक्रम चलाया। ‘दो बच्चे ही बहुत’ इस नारे का खूब प्रचार किया गया। जगह जगह परिवार नियोजन सेंटर स्थापित किए गए। हर पोल और सार्वजनिक जगह पर परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाला प्रचार अभियान चलाया गया। वहां किसी का भी जबर्दस्ती बंध्याकरण नहीं किया गया। दूर गांवों में घर घर गर्भ निरोधक गोलियां बांटी गई। सरकार ने इस काम में मौलवियों का भी साथ लिया। इंडोनेशिया की सरकार ने नेशनल फैमिली प्लानिंग कोआर्डिनेशन बोर्ड बनाया और उसमें इंडोनेशिया के सबसे बड़े मुस्लिम समूह मोहम्मदियों को शामिल किया। सबसे आश्चर्यजनक बात ये कि इंडोनेशिया के मदरसों और स्कूलों में भी सेक्स शिक्षा को शामिल किया गया। परिणाम हुआ कि इंडोनेशिया में गर्भाधान का औसत काफी नीचे आ गया। इंडोनेशिया में 1970 में प्रत्येक महिला के औसतन 5.6 बच्चे थे जो 2010 में 2.6 रह गए। 2019 में तो इंडोनेशिया में प्रति 1000 की जनसंख्या पर 15.79 बच्चों का जन्म हुआ।

पाकिस्तान

पाकिस्तान में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर ना तो कोई नीति है और ना कोई कार्यक्रम। इसलिए पाकिस्तान को जनसंख्या विस्फोट के मुहाने पर खड़ा देश माना जा रहा है। हाल ही में पाकिस्तान के मुख्य न्यायाघीश जस्टिस साकिब निसार के नेतृत्व में तीन जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाकिस्तान के मुस्लिम , राजनीतिज्ञों और स्कूल संचालकों से अपील की कि वे पाकिस्तान में अधिकतम दो बच्चे की योजना लागू करने में मदद करें। तीनों जजों की टिप्पणी थी कि पाकिस्तान जनसंख्या बम के मुहाने पर बैठा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से पाकिस्तान की जनसंख्या बढ़ रही है उससे पाकिस्तान का संसाधन वहन नहीं कर सकता। 2017 की जनगणना के अनुसार पाकिस्तान की जनसंख्या 20 करोड़ 77 लाख है। पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन के अनुसार पाकिस्तान की 60 प्रतिशत जनसंख्या 25 साल से कम की है। 2.5 करोड़ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, 90 प्रतिशत जनसंख्या को साफ पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। पाकिस्तान में 2017 में प्रति 1000 की जनसंख्या पर 21.9 बच्चों का जन्म हुआ।

बांग्लादेश

बांग्लादेश में भी जनसंख्या का बोझ बहुत ज्यादा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश ने इस समस्या का समाधान निकालने की गंभीर कोशिश की है। बांग्लादेश ने भी जनसंख्या नियंत्रण का वही तरीका निकाला जो इंडोनेशिया ने अपनाया था। यानी सीधे लोगों से संपर्क कर उन्हें अधिक बच्चे ना पैदा करने के प्रति जागरूक करना। बांग्लादेश की सरकार ने वहां के गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर घर-घर गर्भ निरोधक गोलियां और टीके का वितरण कराना शुरू कर दिया। इसका परिणाम है कि बांग्लादेश में जहां 1975 में गर्भनिरोधक का उपयोग केवल 8 प्रतिशत था वह 2011 में बढ़कर 61 प्रतिशत हो गया। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि बांग्लादेश ने जब से महिलाओं को माइक्रोक्रेडिट देना शुरू किया है तब से जनसंख्या वृद्धि दर में भी कमी आनी शुरू हो गयी है। वहां महिलाएं अब आत्मनिर्भर हो रही है इसलिए उनके बच्चे भी कम हो रहे हैं। बांग्लादेश संभवतः पहला मुस्लिम देश है जहां जनसंख्या नियंत्रण को महिला सशक्तिकरण से जोर दिया गया है। 2017 में प्राप्त आकड़े के अनुसार बांग्लादेश में प्रति 1000 की जनसंख्या पर 18.8 बच्चों का जन्म हुआ।

भारत

भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना के समय से ही जनसंख्या नियंत्रण पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन भारत में पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 16 अप्रैल 1976 को अस्तित्व में आई। शारदा एक्ट में संशोधन कर शादी के लिए लड़कों की न्यूनतम वैधानिक उम्र 18 से बढ़ाकर 21 की गई और लड़कियों की उम्र 14 से बढ़ाकर 18 कर दी गई। उसी समय देश में जबरन बंध्याकरण लागू किया गया जिसे बाद में देश में आपातकाल लगाने का भी एक कारण माना गया। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार आई तो परिवार नियोजन विभाग का नाम बदल कर परिवार कल्याण विभाग कर दिया गया।

1977 से लेकर 1993 तक देश में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर एक तरह से उदासीनता बनी रही। बाद में नरसिंह राव की सरकार ने एम एस स्वामीनाथन के नेतृत्व में जनसंख्या नियंत्रण पर एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया। इस कमेटी ने 1994 में अपनी रिपोर्ट दे दी, जिसका समीक्षा परिवार कल्याण बोर्ड ने 1999 में की और इसे संसद ने वर्ष 2000 में पारित कर दिया। इसके तीन उददेश्य निश्चित किए गए।

  1. अस्थाई उद्देश्य- इसके तहत जनसंख्या नियंत्रण के लिए जरूरी उपकरणोंकी आपूर्ति व स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की नियुक्ति रखा गया।
  2. मध्यावधि उद्देश्य – वर्ष 2010 तक टोटल फर्टिलिटी रेट 1 प्रतिशत तक लाना, ताकि जनसंख्या का मृत्युदर से स्थापन्न हो जाए।
  3. दिर्घावधि उददेश्य – 2045 जनसंख्या वृद्धि दर को स्थिर कर दियाजाए।

साथ में यह भी लक्ष्य रखा गया कि 2010 तक फर्टिलिटी रेट 2.1 प्रतिशत पर लाया जाए।

जनसंख्या नियंत्रण के लिए उच्च श्रेणी की सेवाएं शुरू की जाए ताकि पूरे देश में दो बच्चों का लक्ष्य हासिल किया जा सके।

नवजात बच्चों की मृत्यु दर में कमी करते हुए इसे प्रत्येक 1000 में 30 बच्चे तक लाया जाए

जच्चा मृत्यु दर में भी कमी करते हुए इसे प्रत्येक लाख में 100 के नीचे लाया जाए।

लड़कियों में शादी देर से करने को प्रोत्साहन दिया जाए।

हालांकि देश में फर्टिलिटी रेट में कमी आई है लेकिन 2016 के आकड़े के अनुसार यह अभी भी 2.33 प्रत्येक महिला है। मुस्लिम महिलाओं में यही फर्टिलिटी रेट 2.66 है। लेकिन अभी भारत में जन्म दर काफी अधिक है। 2017 में प्रत्येक 1000 की जनसंख्या पर 19 बच्चों का औसत जन्म हुआ।

नवजात मृत्यु दर में कमी का लक्ष्य अभी भी हम हासिल नहीं कर पाए हैं। 2016 के आकड़े के अनुसार देश में प्रत्येक 1000 बच्चे के जन्म में 34 बच्चों की मृत्यु हो जाती है। हालांकि जब से मोदी सरकार केंद्र में आई हैं इसमें काफी सुधार हुआ है। वर्ष 2015 में प्रत्येक 1000 बच्चों के जन्म में 37 बच्चों की मृत्यु हो जाती थीजो अब34 है।

इसी तरह से प्रसव के दौरान मृत्यु का औसत अभी भी प्रत्येक लाख में 100 से उपर है। लेकिन सच्चाई यह भी है नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा मातृत्व की रक्षा के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओ के कारण यह मृत्यु दर काफी नीचे आ गई है। वर्ष 2011-13 में प्रसव के दौरान मृत्यु का औसत प्रति लाख 167 था, जो 2017-18 में घटकर प्रति लाख 130 पर आ गया।

अब देश में फिर से जनसंख्या नीति बनाने की मांग उठ रही है। 125 सांसदों ने राष्ट्रपति कोविंद से मिलकर यह मांग की है कि देश में अनिवार्य रूप से दो बच्चे की नीति लागू की जाए। यही नहीं विभिन्न न्यायालयों में भी जनसंख्या नियंत्रण के लिए कानून बनाने को सरकार को निर्देश देने की मांग वाली याचिकाएं दायर की गई हैं। अब देखना है कि सरकार क्या करती है।

अत्यधिक जनसंख्या के कारणों में कानूनी कम सामाजिक कारण ज्यादा जिम्मेदार हैं। चीन को छोड़कर और किसी देश ने कानून का डंडा दिखाकर जनसंख्या नियंत्रण नहीं किया है। हां सरकार ने नियम बनाए हैं लेकिन उन्हें लागू जनता के सहयोग से ही किया है। दृढ़ इच्छा शक्ति और सतत अभियान से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। मैक्सिको, इंडोनेशिया और बांग्लादेश इसके उदाहरण हैं। इसकी शुरूआत एक नीचे से हो सकती है। स्कूल स्तर से ही जैसा कि इंडोनेशिया ने किया है। इंडोनेशिया ने ही यह कर दिखाया है कि जनसंख्या नियंत्रण का मजहब से कोई लेना देना नहीं है। फिर शादी की उम्र बढ़ाकर जैसा चीन ने किया है। या फिर हर घर से इस अभियान को जोड़कर जैसा बांग्लादेश ने किया है।

अच्छी बात यह है कि भारत में आम लोगों को यह अहसास है कि अधिक बच्चों को जन्म देना सेहत और भविष्य से खिलवाड़ करना है। हां यह अहसास शहरी क्षेत्र में ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कम। समय आ गया है कि अब हर भारतीय इस बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या पर आत्ममंथन करे।

Share