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अफगान शांति के पीछे पाकिस्तान का असली मकसद

Peace process in Afghanistan

अफगान शांति वार्ता की जल्दबाजी में पाकिस्तान के अपने हित छिपे हुए हैं। वह एक तरफ जल्दी से जल्दी अमेरिका के साथ पुराने संबंध को जीवित करना चाहता हैं वहीं दूसरी तरफ  अफगानिस्तान में भारत की उपस्थिति को कम या खत्म करना चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भी इस जल्दी में है कि अफगानिस्तान में फंसे अपने बाकी बचे 14,000 सैनिकों को निकाल लें और शांति के नाम पर अफगानिस्तान से वापस आ जाएं। लेकिन इस जल्दबाजी में अफगानिस्तान में शांति की प्रक्रिया स्थाई नहीं दिख रही है। बल्कि इस बात का खतरा ज्यादा है कि अफगानिस्तान सें अमेरिकी फौज निकलते ही वहां फिर से अराजकता और हिंसा का दौर शुरू हो जाएगा।

अफगानिस्तान में 2001 से है अमेरिकी फौज

1996 में अफगानिस्तान में तालिबान शासन आया। पूरी तरह मुस्लिम कानूनों पर आधारित इस तालिबान शासन ने लोगों में तबाही ला दी। खास कर महिलाओं की स्थिति काफी नाजुक हो गई। शरिया कानून की आड़ में लोगों पर खूब जुल्म किए गए। तालिबान ने अपने नियंत्रण वाली जगहों पर आतंकवादी संगठन अलकायदा का ट्रैनिंग कैंप चलाना शुरू कर दिया। सितंबर 2001 में अलकायदा ने ही वर्ल्ड ट्रेड टावर पर विमान से हमला किया जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। उसके बाद अक्टूबर 2001 में ब्रिटेन और अमेरिका की फौजों ने अफगानिस्तान में सैन्य ऑपरेशन कर तालिबानियों को खदेड़ना शुरू किया।

17 साल से चल रहा युद्ध

अफगान तालिबान और अमेरिकी फौजों के बीच 17 साल से लगातार युद्ध चलने के बाद कतर की राजधानी दोहा में एक अनौपचारिक बैठक अप्रैल में हुई। उसके पहले अफगान तालिबानों से बातचीत के लिए अधिकृत अमेरिकी मध्यस्थ जलमे खलीलजाद काबुल में अन्य तालिबान प्रतिनिधियों से मिल कर बातचीत का माहौल बनाने में लगे रहे थे। खलीलजाद अमेरिकी अफगान मूल के डिप्लोमेट हैं। अमेरिकी सरकार की बातों से लगता है कि वह युद्ध से थक चुका है, इसलिए वह अफगानिस्तान से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रहा है। इन 17 वर्षों में अमेरिका युद्ध पर 975 अरब डॉलर खर्च कर चुका है और उसके 2,732 सैनिक मारे जा चुके हैं। ट्रंप ने अमेरिकी अधिकारियों की भरी सभा में कहा- महान देश लंबे युद्ध नहीं किया करते’।

पाकिस्तान पहले युद्ध में कमाया अब शांति प्रयास में भी कमाने की कोशिश

यह जानते हुए कि अमेरिका बिना पाकिस्तान के सहयोग के अफगानिस्तान में लड़ाई नहीं जीत सकता, इसका फायदा पाकिस्तान के हुक्मरानों ने जमकर उठाया। 2002 से लेकर 2016 तक अमेरिका ने पाकिस्तान को तालिबान वाले इलाकों में आतंकवादियों के खिलाफ मिलिट्री ऑपरेशन के लिए 14 अरब डॉलर और अन्य मदों को मिलाकर 33 अरब डॉलर दिए। लेकिन ओबामा प्रशासन ने अंतिम दिनों में यह कहते हुए कि पाकिस्तान तालिबान के मामले में डबल क्रॉस कर रहा है उसको दी जाने वाली सहायता रोक दी थी।

अफगान में शांति वार्ता को लेकर पाकिस्तान काफी सक्रिय

अब जब से इमरान खान की सरकार आई है तब से अफगान में शांति वार्ता को लेकर पाकिस्तान काफी सक्रिय है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान की नजर उस 800 मिलियन डॉलर की सहायता पर टिकी हुई है, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप की अनुमति से जारी किया जा सकता है। इसलिए इमरान पूरी तरह ट्रंप को खुश करने में लगे है ताकि 800 मिलियन डॉलर की रकम पाकिस्तान को मिल सके। अभी तक ट्रंप भी यह कहते रहे हैं कि पाकिस्तान ने अमेरिका को मूर्ख बना कर 33 अरब डॉलर ले लिया, जबकि वह तालिबानियों की ही मदद करता रहा है।

ट्रंप ने पाकिस्तान को ललचाया

डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से यह कहते नजर आए – हम वर्षों से 1.3 अरब डॉलर देते आ रहे थे। लेकिन पाकिस्तान के साथ समस्या यह थी कि आपके (इमरान खान) आने से पहले हमारे लिए कोई कुछ नहीं कर रहा था। ईमानदारी से कहें तो आपके आने के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के बीच अब तक का सबसे अच्छा संबंध स्थापित हुआ है। यह सब (आर्थिक सहायता) वापस आ सकता है बशर्ते पाकिस्तान हमारे लिए कुछ करे। उसके बाद तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान फूले नहीं समा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और अमेरिका इस मामले में एक ही पेज पर हैं कि अफगानिस्तान में शांति  युद्ध के जरिए नहीं आ सकती।

शांति प्रयास पर अभी भी अनिश्चितता

भले ही अमेरिका और पाकिस्तान तालिबान से बात चीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रहे हों। लेकिन खुद अफगानी मानते हैं कि माहौल अभी भी इतना खतरनाक है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है। उन्हें इस शांति प्रयास में कई झोल दिख रहे हैं। सबसे पहले यह कि तालिबानी नेता अमेरिका से यह ठोस आश्वासन चाहते हैं कि अमेरिकी फौज अफगानिस्तान छोड़ रही है, तभी वह सीज फायर के समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। दूसरा यह कि वह अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार से कोई बातचीत नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें वे अमेरिकी कठपुतली मानते हैं और तीसरी सबसे बड़ी बात यह कि वे सितंबर में होने वाले अफगानिस्तान के चुनाव में भाग नहीं लेंगे। यही नहीं यह भी तय नहीं है कि तालिबान अफगानिस्तान में फिर से शरिया कानून के तहत शासन व्यवस्था चलाएंगे या फिर कोई संविधान बनाएंगे।

भारत को अलग थलग करने की कोशिश

अफगानिस्तान की किसी भी शांति प्रक्रिया में भारत को शामिल किए बिना कोई स्थाई हल नहीं हो सकता। यह  जानते हुए भी पाकिस्तान इस बात की कोशिश कर रहा है कि भारत इस वार्ता में कोई पक्ष ना बने। लेकिन सबसे आश्चर्य की बात ये है कि जिस देश के लिए शान्ति वार्ता हो रही है वो अफ़ग़ानिस्तान सभी देशों में सबसे ज्यादा भरोसा भारत पर ही करता है। भारत ने अफ़ग़ानिस्तान में कई विकास कार्य भी किये हैं।

क्या चीन से बढ़ रही है पाकिस्तान की दूरी

इमरान खान के अमेरिकी दौरे से जो पाकिस्तान को आशा बंधी है , उसका सबसे बड़ा कारण अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया की शुरूआत है। इस बहाने पाकिस्तान चाहता है कि अमेरिका से उसके रिश्ते सुधर जाए। क्योंकि इन दिनों चीन के साथ पाकिस्तान का उस तरह का संबंध नहीं रहा, जो इमरान के आने से पहले था। इसके कई कारण है – अजहर मसूद को ग्लोबल आतंकवादी घोषित करने में चीन की भूमिका, बालाकोट में भारत के एयर स्ट्राइक पर चीन की चुप्पी और सीपेक में पाकिस्तान की कम होती रूचि यह दिखाता है कि चीन के साथ पाकिस्तान का रिश्ता पहले जैसा मीठा नहीं रहा।

इन सभी तथ्यों से ऐसा लगता है कि चीन द्वारा सीपैक के लिए दिए गए कर्ज में दब जाने के बाद पाकिस्तान को अमेरिका से आर्थिक सहायता लेने का एक और मौका अफ़ग़ानिस्तान में दिख रहा है जहां शांति प्रक्रिया में अमेरिका को सहयोग देने के बहाने अमेरिका से उसे फिर से ग्रांट मिल सकती है।

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