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महागठबंधन के स्वाहा होने के बड़े कारण

Mahagathbandhan ends India

लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन ने ऐसा शोर मचाया था कि वो लोकतंत्र की नई इमारत बनकर उभरेंगे, लेकिन उनकी नींव ही खोखली निकली। चुनावों के बाद महागठबंधन का हवाई किला बुरी तरह ध्वस्त हो गया। मायावती ने तो दिखा भी दिया कि सपा-बसपा का साथ महज चुनावी साथ था। आखिर क्या वजहें थी जिससे महाठबंधन स्वाहा हो गया।

यूपी में अतिआत्मविश्वास महागठबंधन को पड़ा भारी

उत्तर प्रदेश से बीजेपी को उखाड़ फेंकने के संकल्प के साथ गठित सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन को लोकसभा चुनाव में नाकामी हाथ लगी। प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 15 सीटें महागठबंधन के अतिआत्मविश्वास की कहानी खुद बयां कर रही हैं। बीजेपी की मजबूत रणनीति से इनका गठजोड़ असफल रहा।

जाति आधारित राजनीति नहीं चली

सपा-बसपा-रालोद गठबंधन इस खुशफहमी में था कि यादव, मुस्लिम और जाटव मतदाताओं की जुगलबंदी के बूते वह मैदान मार लेगा, लेकिन गठबंधन के नेता शायद यह नहीं समझ सके कि प्रधानमंत्री मोदी को जाति और धर्म से परे हटकर वोट मिल रहा था।

क्षेत्रीय नेताओं को नजरअंदाज किया गया

अखिलेश और मायावती ने अपने मंच पर अपने दल के किसी क्षेत्रीय नेता को आने ही नहीं दिया, जिसकी वजह से क्षेत्रीय जातीय नेताओं ने उनके लिये कोई खास काम नहीं किया। यही हाल बिहार में भी था।

मोदी हटाओ का नारा भी बड़ी वजह

महागठबंधन में शामिल दलों ने मुद्दों पर नहीं, बल्कि सिर्फ मोदी पर ध्यान दिया। कांग्रेस,सपा, बसपा, आरजेडी, तृणमूल, आरएलडी हो या टीडीपी हर कोई मोदी हटाओ पर केंद्रित रहा। देश के लिए कोइ विजन नहीं पेश कर पाए, जिसकी वजह से जनता ने इन्हे नकार दिया।

जनता को नहीं चाहिए खिचड़ी सरकार

नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री चुनकर देश की जनता ने सीधा संदेश दिया कि उन्हें खिचड़ी सरकार में भरोसा नहीं, बल्कि बहुमत की विकासवादी सरकार चाहिए।

महागठबंधन में किसी सर्वमान्य नेता का न होना

महागठबंधन वाकई बिना ड्राइवर की गाड़ी थी जिसका दुर्घटनाग्रस्त होना पहले से ही तय था। महागठबंधन में आपस में ही कोई सर्वमान्य नेता नहीं था। महागठबंधन में शामिल हर पार्टी का मुखिया खुद को प्रधानमंत्री का दावेदार समझ रहा था।

स्वार्थ और सत्ता लोभ के लिए हुआ गठबंधन

स्वार्थ और सत्ता लोभ के लिए साथ आई पार्टियों में स्वाभाविक रूप से तालमेल की कमी तो होनी ही थी। जनता गैरजिम्मेदार महागठबंधन के हाथ में देश सौंपने के लिए राजी नहीं हुई। उदाहरण के लिए सपा का हाथ झटकने के बाद मायावती ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव, चुनाव में गठबंधन की हार के बाद उन्हें तवज्जो नहीं दे रहे थे, उन्हें फ़ोन तक नहीं कर रहे थे। साथ ही मायावती ने भी इल्ज़ाम लगाया है कि अखिलेश यादव चाहते थे कि चुनाव में बीएसपी कोटे से कम तादाद में मुसलमानों को टिकट दिया जाए। माया का ये कहना है कि ऐसा अखिलेश इसलिए चाहते थे क्योंकि उन्हें ध्रुवीकरण का डर था। माया ने आरोपों की झड़ी लगाते हुए कुछ पुरानी बातें भी उठाई साथ ही अखिलेश सरकार के रवैए और उस दौरान ग़ैर यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ नाइंसाफ़ी का भी ज़िक्र किया।

सीटों के बंटवारे में भी गड़बड़झाला

बिहार में महागठबंधन के दलों के बीच सीट बांटने का ज़िम्मा राष्ट्रीय जनता दल और उसके दो शीर्ष नेता लालू यादव और तेजस्वी यादव के कंधे पर था लेकिन उन्होंने सीटों के तालमेल और उम्मीदवारों के नामों की घोषणा में विलंब किया। मायावती भी अखिलेश पर टिकट बंटवारे पर राजनीति का आरोप लगा ही चुकी हैं।

दक्षिण भारत में बदले समीकरण

दक्षिण भारत में मोदी-विरोधी मोर्चे के प्रमुख खिलाड़ी के तौर पर उभरे चंद्रबाबू नायडू भी महागठबंधन को बचा नहीं सके। खुद अपनी कुर्सी भी उन्हें गंवानी पड़ गई।

आंध्र में लोकसभा के साथ ही हुए विधानसभा की 175 सीटों में से जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस को 147 सीटों पर जीत हासिल हुई। कर्नाटक की 28 सीटों में से बीजेपी ने 25 सीटें जीतीं। कर्नाटक में कुमारस्वामी और कांग्रेस के झगड़े ने जनता का काम आसान किया।  दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए तेलंगाना की जीत अप्रत्याशित थी। यहां लोकसभा की 17 सीटों में से बीजेपी को 4 सीटें मिलीं। वहीं केरल में बीजेपी ने सीटें नहीं जीती,लेकिन उसके उम्मीदवारों ने कांग्रेस और वामपंथी उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर मुंह पर ताले ने की वोट बंदी

वोट बैंक खिसकने के डर से महागठबंधन में शामिल किसी भी पार्टी ने नेशनल सिक्योरिटी पर कोई बात नहीं की, जबकि बीजेपी ने इस मुद्दे पर जमकर अपना पक्ष रखा।

नहीं थी कोई रणनीति

महागठबंधन के नेताओं में चुनाव में क्या रणनीति होनी चाहिए उस पर गंभीरता से कभी बात ही नहीं हुई, जबकि दूसरी तरफ एडीए में संयोजन, तालमेल और आपसी विश्वास खूब था साथ ही अच्छी रणनीति भी थी।

प्रधानमंत्री मोदी की नहीं कोई काट

पूरे चुनाव के दौरान महागठबंधन के नेता प्रधानमंत्री मोदी के सामने असहाय नजर आए। महागठबंधन न तो प्रधानमंत्री के प्रति जनता का विश्वास तोड़ पाई और न ही उनकी कोई काट ढूंढ पाई।

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