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कश्मीर बदल रहा है पर कश्मीरी नेताओं की सोच नहीं

Jammu Kashmir Umar Abdullah

नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर के लोगों को राज्य में आने वाले विधानसभा चुनावों के बहिष्कार को लेकर चेताया है। उमर ने यह कहा कि इससे भाजपा को फायदा होगा। उमर का ये बयान दिखाता है कि कश्मीरी नेताओं को अभी तक ये समझ नहीं आ रहा है कि जम्मू और कश्मीर में अब अलगाववाद की भाषा बोलकर या लोगों को भड़का कर वोट लेने के दिन गए। अब वहां भी लोग सरकार से विकास चाहते हैं। पूरे देश की तरह जम्मू कश्मीर के लोगों ने भी इस वर्ष हुए संसदीय चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व और विकास के कार्यों को वोट किया।

जम्मू कश्मीर राज्य में कश्मीर घाटी का कुछ हिस्सा ही आतंकवाद की चपेट में है। यह कहना सही नहीं कि पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य से अलगाववादियों की आवाज सुनाई दे रही है, कश्मीर घाटी के कुछ सौ लोग ही वहां आतंकवादी गतिविधियों को हवा देते रहते हैं। पाकिस्तान इन्हीं की बदौलत भारत को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है। यहीं के कुछ नेताओं को आजादी के नारे लगाने और पत्थर बरसाने के पैसे मिलते रहे हैं।

यह कहने की जरुरत नहीं कि जम्मू-कश्मीर राज्य में कश्मीर घाटी तीनों संभाग में सबसे छोटा है। इस राज्य के तीन प्रमुख संभागों में जम्मू संभाग 12,378 वर्ग किलोमीटर में लद्दाख संभाग 33,554 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में और कश्मीर घाटी संभाग केवल 8,639 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। संख्या के दृष्टिकोण से भी घाटी संभाग जम्मू के बाद दूसरे स्थान पर लगभग 55 लाख की आबादी वाला क्षेत्र है, जहां आंतकवाद का बीज 80 के दशक में बोया गया और उसे अभी तक पनपने दिया गया। घाटी का कुपवाड़ा जिला आंतकवाद का सबसे प्रमुख गढ़ है। यहीं से वर्ष 1988-89 में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट ने अपनी शुरूआत की थी और यहीं से होकर ज्यादातर कश्मीरी आतंकवादी पाकिस्तान प्रशिक्षण के लिए जाते रहे हैं या वहां से प्रशिक्षित होकर भारत में घुसपैठ करते रहे हैं।

कुपवाड़ा के बाद बारामुला सबसे ज्यादा आतंकवाद प्रभावित जिला है। पाकिस्तान की सीमा से लगे होने के कारण यहां से लगातार घुसपैठ होती रही है। इसी जिले में सोपोर है जहां अक्सर आंतकवाद की घटनाएं सुनाई देती हैं। श्रीनगर भी हालांकि घाटी में है, लेकिन यहां आतंकवाद की घटनाओं पर पुलिस और सेना के जवानों ने बड़ी मुस्तैदी से रोक लगा रखी है। यह जम्मू-कश्मीर की राजधानी होने के नाते व्यापार और पर्यटन का भी बहुत बड़ा केंद्र है, लेकिन यहां से कुछ ही किलोमीटर दूर बडगाम भी आतंकवादियों का गढ़ है। पाकिस्तान में बैठा हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुखिया सैयद सलाउद्दीन इसी जिले का रहने वाला है और यहां 1988-89 से ही आंतकवादी गतिविधियां संचालित कर रहा है।

कश्मीर में यदि कुछ आंतकवादी संगठन सक्रिय हैं तो उनके लिए समर्थन जुटाने और धन मुहैया कराने वालों में ऑल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, लश्कर-ए-जब्बर, लश्कर-ए-उमर, मुताहिदा जेहाद काउंसिल और तेहरिक-उल-मुजाहिद्दीन जैसे संगठन हैं। सीमा पार से जकात के नाम पर लिए गए धन और हथियार मुहैया कराने वालों में पाकिस्तान सरकार, हाफिज सईद, आईएसआई, जैश-ए-मुहम्मद और अरब के कुछ संगठन भी शामिल हैं, लेकिन परोक्ष रूप से देखें तो नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी राजनितिक पार्टियां भी जिम्मेदार हैं। वोट के लिए ये पार्टियां वही भाषा बोलती हैं जो आतंकवादियो को सुहाता है। उमर ने भी अपने बयान में यही कहा है कि जिस ट्राल से बुरहान वानी और जाकिर मूसा निकले हैं वहां बीजेपी जीत जाएगी, यदि विधान सभा में वोट (उनकी पार्टी को) नहीं दिया।

यह कयास लगाना मुश्किल नहीं है कि आखिर इतने छोटे हिस्से में इतनी वारदातें कैसे हो सकती हैं। कारण कई हैं और उनमें सबसे प्रमुख कारण है पाकिस्तान द्वारा लगातार कश्मीरी युवकों को भड़काने की कार्रवाई और भारत के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें खूब सारा पैसा और ऐश करने की छूट प्रदान करना है।

कुछ वर्ष पहले तक पाकिस्तान यही काम भाड़े के आतंकियों से कराता था, लेकिन जब से घुसपैठ पर मोदी सरकार ने लगाम लगाई। सीमा पर ही घुसपैठिये मारे जाने लगे तब से पाकिस्तान सरकार, आईएसआई और उनके यहां बैठे कश्मीर के एजेंट स्थानीय लड़कों को जिहाद के लिए उकसाने में लग गए हैं।

जिस कश्मीर को भारत से अलग करने के प्रयास में कुछ भटके लोग और कुछ शातिर दिमाग लगे हैं उसी कश्मीर को भारत के साथ बनाए रखने और भारत की सेवा करने के जज्बे वाले लोग भी हैं। नई पीढ़ी में रूबेदा ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें वर्ष 2015 में कश्मीर की पहली महिला आईपीएस होने का गर्व प्राप्त हुआ। यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है, बल्कि वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से सात युवक युवतियां भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुने गए हैं।

लोगों को यह जानने की आवश्यकता है कि एक तरफ कुछ दर्जन लोग कश्मीर में भारत के खिलाफ लड़ रहे हैं तो वहीं साढ़े तीन लाख से अधिक जम्मू-कश्मीर में वे कर्मचारी हैं जो भारत के संविधान को मानकर उसकी रक्षा करने और उसे अक्षुण्ण रखने का वचन लेते हैं। लगभग 90 हजार कश्मीरी पुलिस बल में हैं जो दिन रात सीमा के भीतर लोगों की जान माल की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कश्मीर तो बदल रहा है पर कश्मीरी नेता अभी भी पुराने तौर तरीकों से अपनी हुकूमत कायम रखना चाहते हैं। घाटी के नाम पर अपनी दुकान चलाते रहने का समय अब जा रहा है। ये बात वहां के नेताओं को जितना जल्दी समझ आ जाए, कश्मीर के लोगों के विकास के लिए उतना ही अच्छा है।

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