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देशभक्ति की मिसाल हैं ये पांच उदाहरण

independence day 2019

73वें स्वतंत्रता दिवस पर इस लेख में पांच ऐसे विषय – एक शहीद, एक गांव, एक फिल्म, एक कवि और एक निर्णय के बारे में बताया गया है जो देशप्रेम से जुड़े  है।

शहीद कैप्टन विजयंत थापर - प्राण जाए पर वचन न जाए

कश्मीर के कुपवाड़ा में एक सैनिक तैनात था जिसकी एक नन्ही कश्मीरी बच्ची दोस्त थी। बच्ची के पिता को आतंकियों ने मार दिया था। बच्ची को सैनिक ने बहुत प्यार दिया। जीतेजी और मरने के बाद भी…वो प्यारी बच्ची थी रुखसाना और वो सैनिक थे शहीद कैप्टन विजयंत थापर।

1999 में कैप्टन विजयंत थापर 2 राजपूताना राइफल्स में तैनात थे। उनकी यूनिट के नजदीक 6 साल की नन्ही कश्मीरी बच्ची रुखसाना रहती थी जिनके पिता की आतंकियों ने हत्या कर दी थी। एक दिन कैम्प से बाहर कैप्टन थापर ड्यूटी के दैरान खाना खा रहे थे तो रुखसाना वहां आ के बैठ गई।

कैप्टन थापर ने उसे भी खाना खिलाया और उस से पूछा कि तुम स्कूल क्यों नहीं जाती हो? वहां आस-पास जांच करने पर पता चला कि रुखसाना के परिवार के पास पैसे नहीं हैं और उस के पिता को आतंकियों ने मार दिया है। कैप्टन थापर ने कहा कि रुखसाना की पढ़ाई का सारा खर्च वह खुद उठाएंगे। इसके बाद कारगिल युद्ध शुरू हो गया। कैप्टन थापर ने अपने पिता रिटायर्ड कर्नल वी एन थापर को चिट्ठी लिखी और कहा कि अगर युद्ध में उसे कुछ हो जाता है तो आप स्वयं रुखसाना की पढ़ाई व उसकी देखरेख का खर्च उठाएंगे।

कारगिल युद्ध में कैप्टन थापर शहीद हो गए,लेकिन कैप्टन थापर के पिता रिटायर्ड कर्नल वी एन थापर रुखसाना की पढ़ाई व देखरेख का खर्च उठा रहे हैं। रुखसाना अब बड़ी हो चुकी है और जल्द ही उसकी शादी होने वाली है। शहीद कैप्टन विजयंत थापर को श्रद्धांजलि व उनके पिता कर्नल थापर को सलाम।

सैनिकों का ‘एक गांव’, जहां है एक शहीद स्मारक

देश में एक गांव ऐसा भी है जहां हर घर से कम से कम एक आदमी सेना में है?  किसी-किसी घर से 4-4 लोग सेना में शामिल होकर देश की सेवा कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में अमरावती से 150 किलोमीटर दूर गोदावरी ज़िले की गोद में बसा एक छोटा सा गांव है माधवरम। इस गांव का अपने निवासियों को सैन्य सेवा में भेजने का एक अलग ही शानदार इतिहास है, जो करीब 300 साल पुराना है। इस गांव में सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो सेना में ही कोई न कोई नौकरी कर रहे हैं।

100 से भी ज्यादा परिवारों ने बड़े ही गर्व के साथ अपने सम्बन्धियों द्वारा युद्ध में जीते गए पदकों को घर में सजाया हुआ है। गांव में नौकरी से रिटायर लोग खुद को अपने नाम से बुलाये जाने की जगह सेना में अपने पद के नाम के बुलाया जाना पसंद करते हैं। यहां की औरतें भी एक सैनिक से शादी करना ज़्यादा पसंद करती हैं और यहां तक कि बच्चों के नाम कर्नल, मेजर और कैप्टन रखे जाते हैं।

माधवरम गांव 17वीं शताब्दी के गजपति राजवंश, जिसका शासन आज भी उड़ीसा और दक्षिणी पठार पर है, के राजा पुष्पति माधव वर्मा ब्रह्मा का रक्षा ठिकाना था। इन राजा के ही नाम पर इस गांव का नाम माधवरम पड़ा, राजा ने माधवरम से 6 किमी दूर आरुगोलु गांव में मोर्चेबंदी के लिए एक किला भी बनवाया था, जिसके अवशेष आज भी वहां मौजूद हैं।

माधवरम के लोगों ने यहां के सैनिकों के बलिदान और सेवा की स्मृति में नयी दिल्ली अमर जवान ज्योति की तर्ज़ पर एक शहीद स्मारक का निर्माण कराया है।

स्रोत – द बैटर इंडिया

देशभक्ति की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘शहीद’ - बटुकेश्वर दत्त की कहानी, बिस्मिल के गीत

स्वतंत्रता दिवस को लेकर भी बॉलीवुड में कई फिल्में बनी हैं जिसमें भारत के इतिहास और आजादी के मायने बताए गए हैं, लेकिन भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम पर बनी फिल्म शहीद एक यादगार फिल्म है। भगत सिंह के जीवन पर 1965 में बनी शहीद देशभक्ति की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कही जाती है, जिसकी कहानी खुद भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त ने लिखी थी। इस फ़िल्म में अमर शहीद राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ के गीत थे। मनोज कुमार ने इस फिल्म में शहीद भगत सिंह का जीवन्त अभिनय किया था। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम पर आधारित यह अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक फ़िल्म है। यह भी महज़ एक संयोग ही है कि जिस साल यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी उसी साल बटुकेश्वर दत्त का निधन भी हुआ। फ़िल्म की कहानी सन् 1916 के हिन्दुस्तान की पृष्ठभूमि में सरदार किशन सिंह और उनके परिवार के साथ शुरू होती है और कहानी सुखदेव-राजगुरु-भगतसिंह की फांसी के साथ खत्म होती है। इसका हर गाना चाहे वो ऐ वतन हमको तेरी कसम, सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, मेरा रंग दे बसंती चोला, पगड़ी सम्हाल जट्टा, वतन पर मरने वाले जिंदा रहेगा तेरा नाम, आज भी रगों में देशभक्ति का जुनून भर देते हैं।

सात दशक बाद मिली धारा 370 से आजादी - देशवासियों ने मिलकर लिया निर्णय

जम्मू-कश्मीर-लद्दाख 70 सालों तक अन्याय झेलने के बाद अब धारा 370 से आजाद है। 5 अगस्त 2019 की तारीख में स्वतंत्र भारत का नया इतिहास लिख दिया गया। 17 अक्टूबर 1949 को संविधान में राष्ट्रपति के आदेश से जोड़े गये अनुच्छेद 370 को मोदी सरकार ने खत्म कर दिया गया। संविधान निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर अनुच्‍छेद 370 के विरोधी थे। उन्‍होंने इसका मसौदा तैयार करने से इनकार कर दिया था। अम्बेडकर के मना करने के बाद शेख अब्‍दुल्‍ला नेहरू के पास पहुंचे और प्रधानमंत्री के निर्देश पर गोपालस्‍वामी अयंगर ने मसौदा तैयार किया था। शेख अब्‍दुल्‍ला को अनुच्‍छेद 370 पर लिखे पत्र में बाबा साहब आंबेडकर ने कहा था कि आप चाहते हैं कि भारत जम्‍मू-कश्‍मीर की सीमा की रक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज सप्‍लाई करे। साथ ही, कश्‍मीर को भारत के समान अधिकार मिले, लेकिन आप चाहते हैं कि कश्‍मीर में भारत को सीमित शक्तियां मिलें। ऐसा प्रस्‍ताव भारत के साथ विश्‍वासघात होगा, जिसे कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्‍वीकार नहीं करूंगा। अनुच्छेद-370 व 35ए खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर सही मायनों में भारत का अभिन्न अंग हो गया है। देश के के लिए ये बहुत बड़ी  खुशखबरी है, जिसका इंतजार देश को आजादी के बाद से था।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण ने रचा राष्ट्र-प्रेम, आजादी और भारतीयता का काव्य

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय कवि थे। उन्होंने आम-जन के बीच प्रचलित देशी भाषा को मांजकर जनता के मन की बात, जनता के लिए, जनता की भाषा में कही। उनकी रचनाओं में देशभक्ति, बंधुत्व भावना, राष्ट्रीयता, गांधीवाद, मानवता और नारी के प्रति करुणा और सहानुभूति के स्वर मुखर हुए। उनके काव्य का मुख्य स्वर राष्ट्र-प्रेम, आजादी और भारतीयता है।

जैसे-

भारत माता का मंदिर यह

समता का संवाद जहां,

सबका शिव कल्याण यहां है

पावें सभी प्रसाद यहां

जातिधर्म या संप्रदाय का,

नहीं भेदव्यवधान यहां,

सबका स्वागत, सबका आदर

सबका सम सम्मान यहां

राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का,

सुलभ एक सा ध्यान यहां,

भिन्नभिन्न भव संस्कृतियों के

गुण गौरव का ज्ञान यहां

(कविता भारत माता का मंदिर यह का अंश)

मैथिलीशरण गुप्त जी ने ऐसी कई कविताओं से राष्ट्र में आजादी का जोश भरा।

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