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ईवीएम से छेड़छाड़ – विपक्ष का जहरीला दुष्प्रचार

EVM Election Commission

अभी लोकसभा चुनाव का परिणाम सामने आया नहीं, कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता ईवीएम को लेकर ना सिर्फ अफवाहें फैला रहे हैं, बल्कि कई जगहों पर ईवीएम वाले स्ट्रांग रूम के बाहर प्रदर्शनकर रहे हैं, रखवाली का नाटक फैला रहे हैं।  कांग्रेस समेत विपक्ष के तमाम बड़े नेता आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई में चुनाव आयोग को एक प्रवितेदन भी दिया, जिसमें ईवीएम के लेकर तमाम आशंकाएं और वीवीपैट के मिलान की मांग की गई है। कांग्रेस ने देश के कई हिस्सों में स्ट्रांगरूम से ईवीएम स्थानांतरित किए जाने की भी शिकायतें की हैं। ये शिकायतें उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब की हैं।

कांग्रेस  और अन्य विपक्षी  ईवीएम के प्रति देश में अविश्वास का माहौल बनाने की कोशिश मैं है, ताकि वे अपनी हार की जिम्मेदारी से बच सके। इन विरोधी दलों ने ना तो पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के चुनाव आयोग की तारीफ करने संबन्धी बयान को महत्व दिया और ना ही  सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बेहद गंभीर टिप्पणी पर। 21 मई को ईवीएम से संबंधित दायर एक याचिका पर जिसमें  याचिका कत्र्ता ने  100 प्रतिशत वीवीपैट के मिलान की बात की थी, पर सुनवाई करने हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘इस मामले पर पहले ही मुख्य न्यायाधीश की बेंच फैसला दे चुकी है फिर आप इस मामले को वेकेशन बेंच के सामने क्यों उठा रहे हैं?‘. इस याचिका को बकवास बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही करते रहे तो इससे लोकतंत्र को नुकसान होगा।

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने भी विपक्ष के सारे आरोपों को गलत बताया और तथ्यों के साथ स्पष्टीकरण जारी किया। लेकिन विपक्ष कहां मानने वाला है। ईवीएम को कोसने का सिलसिला जारी है। जबकि कई बार यह साबित हो चुका है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता। हम सबको यह मालूम होना चाहिए कि इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण बनाने वाले देश के दो सार्वजनिक उपक्रम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक्स कारपोरेशन आफ इंडिया लिमिटेड की देख देख में बेहद मजबूत सुरक्षा तंत्र द्वार इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग मशीन बनाए जाते हैं। इसलिए उनको टैम्पर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। फिर भी विपक्ष बैलट पेपर छीनने, मारपीट करने और चुनाव कर्मियों को यातना देने वाली व्यवस्था पर लौटने को आतुर है।

कैसे रची जा रही हैं साजिश

कांग्रेस की शह पर कुछ माह पहले हाल ही में लंदन में एक तमाशा किया गया जिसका लक्ष्य भारतीय लोकतंत्र पर कुठाराघात करना और हमारे स्वतंत्र चुनाव आयोग को  कठघरे में खड़ा करना था। ताकि जनता के बीच यह भ्रम पैदा हो कि लोकतंत्र जनता के लिए जनता के द्वारा नहीं, बल्कि षडयंत्र और अपराध तंत्र के गठजोड़ के भरोसे चल रहा है। इस षडयंत्र के किरदारों में चाहे सैयद शुजा हो या आशीष रे या फिर कपिल सिब्बल किसी ने भी अपनी मर्यादा नहीं समझी। कह दिया कि 2014 में कांग्रेस को जनता के नहीं हैकरों ने सत्ता से बेदखल किया था। एक कपोल कल्पित कहानी गढ़ी गई और इसे पूरी दुनिया के सामने परोस दिया गया।

प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ घृणा में अंध इन लोगों ने भारत की गरिमा को ही तार तार करने का षडयंत्र रच डाला। बाद में पता चला कि जिस आशीष रे ने स्वघोषित हैकर शुजा की प्रेस कांफ्रेंस आयोजित की थी, दरअसल वह कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी का करीबी है। कई बार वह राहुल गांधी के साथ देखा जा चुका है।

यहाँ  यह भी याद करना चाहिए कि यह कांग्रेस ही है जिसने 2014 में आम चुनाव में हारने के बाद ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप लगाने का सिलसिला शुरू किया था। लेकिन जब चुनाव आयोग ने यह चुनौती दी कि कोई भी पार्टी आकर ईवीएम को हैक करके दिखाए तो केवल कांग्रेस ही नहीं विपक्ष की कोई भी पार्टी चुनाव आयोग के कार्यालय अपना दावा सिद्ध करने नहीं पहुंची। इसका मतलब उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि ईवीएम को लेकर उनके आरोप या झूठे दावे सिर्फ राजनीतिक गलथोथई के लिए है, उसका कोई और मकसद नहीं है।

कैसे काम करता हैं ईवीएम

आखिर किस तरह ईवीएम मशीन काम करता हैं इसे इस तरह जान सकते हैं। । वोट दर्ज करने के लिए जिस इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का इस्तेमाल होता है उसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, यानी ईवीएम कहते हैं.। ईवीएम की दो इकाइयां होती हैं.।  एक के माध्यम से वोट दर्ज कराए जाते हैं, जिसे मतदान इकाई कहते हैं, जबकि दूसरे से इसे नियंत्रित किया जाता है, जिसे कंट्रोल यूनिट कहा जाता है. नियंत्रण इकाई मतदान अधिकारी के पास होती है, वहीं मतदाता इकाई मतदान कक्ष के भीतर रखी जाती है.। ईवीएम की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए वीवीपैट यानी वोटर वेरीफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल  की मदद ली जाती है.। वीवीपैट के इस्तेमाल को अनिवार्य किए जाने के बाद यह आशंका भी खत्म हो चुकी है कि ईवीएम का वटन सिर्फ किसी खास पार्टी के पक्ष में वोट वोट दर्ज करता है।

सबसे पहले वीवीपैट का इस्तेमाल नगालैंड के चुनाव में 2013 में हुआ था. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपैट के साथ ही चुनाव कराने की तैयारी करने के निर्देश दिए। 2014 में भी काफी जगहों पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया गया था। 2017 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में आयोग ने 52,000 वीवीपैट का इस्तेमाल किया। इस बार लोक सभा चुनाव में हर जगह वीवीपैट वाली ईवीएम से ही चुनाव संपन्न कराया गया। और सातों चरण के चुनाव में कहीं से भी ईवीएम के बारे में यह शिकायत नहीं आई कि किसी का भी वोट उनकी इच्छा के विरुद्ध किसी और पार्टी के नाम पर गया। लेकिन जब से इक्जिट पोल सर्वे आया है। विपक्ष ईवीएम को लेकर हंगामा शुरू कर चुका है। 23 को मतगणना का इंतजार भी नहीं करना चाहता।

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