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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप – कुछ जानने योग्य बातें

Draft New Educational Policy Hindi

चूँकि सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह सभी भाषाओं के हितों का ध्यान रखेगी, किसी पर भी कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी, तो अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप में शामिल अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर लोगों के बीच चर्चा का अवसर बनता है। 450 पृष्ठों के इस प्रारूप में से हम यहां कुछ महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत कर रहे हैं, जो कि ना सिर्फ दूरदर्शी हैं, बल्कि महत्वपूर्ण बदलाव लाने वाले भी हैं।

शिशु की देखभाल व शिक्षा पर जोर (ईसीसीई)

न्यूरो साइंस कहता है कि 85 प्रतिशत बच्चों में मस्तिष्क विकास 6 साल से पहले हो जाता है। इसका उद्धरण देते हुए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप में कहा गया है कि हमें सभी बच्चों के लिए जरूरी इसीसीई पर समय और साधन का अनिवार्य रूप से निवेश करना चाहिए। प्रारूप में यह तर्क दिया गया है कि आंगनवाड़ी में चूँकि ईसीसीई से जुड़े शिक्षा के पहलु पर थोड़ा नरम रूख रखा जाता है, इसलिए नई नीति में  ईसीसीई को शिक्षा के अधिकार (आरटीई एक्ट) कानून का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए । साथ ही राज्यवार एक ऐसी समिति बनाने की बात कही गई है जिसमें संज्ञानात्मक वैज्ञानिक, शिशु शिक्षा विशेषज्ञ, कलाकार और वास्तुकार शामिल होंगे जो कि आवंटित धनराशि की सीमा में ऐसी जगह का डिजायन करें जहां बच्चों को बुलाया जाए और उन्हें वहां समय बिताने व सीखने की प्रेरणा दी जाए।

गणित व कहानी सुनाना

नई शिक्षा नीति के प्रारूप में कहा गया है कि वर्ग 1-5 तक के छा़त्र-छात्राओं के लिए पाठ्यक्रम एव समय सारणी इस तरह से तैयार किए जाए जिसमें आधारभूत शिक्षा और संख्यात्मक ज्ञान पर ज्यादा जोर हो। उसे इस तरह से डिजायन करें कि बच्चों में गणीत के प्रति रूचि पैदा हो। प्रारूप में इसे प्राप्त करने के तरीके भी बताए गए हैं।

प्रत्येक स्कूल वर्ष में खास तरह से तैयार ‘भाषा सप्ताह‘ और ‘गणित सप्ताह’ मनाया जाएगा। जहां बच्चे भाषा और गणित से जुड़ी विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में भाग लेंगे ।

पुस्तकालयों में भी साप्ताहिक कार्यक्रम किए जाएंगे, जैसे कि कहानी सुनाना, नाट्य मंचन, सामूहिक पाठन, लेखन, और सुलेख व अन्य कलाकृतियों का प्रदर्शन।

बच्चों में प्राकृतिक रूप से तार्किक व गणीतीय सवालों को सुलझाने की समझ पैदा करने के लिए साप्ताहिक मनोरंजक पजल (दिमाग पर जोर डालने वाले खेल) सत्र का आयोजन।

एक्स्ट्रा-करीकुलर कुछ नहीं, अब सब कुछ करीकुलर में ही

वैश्विक मानकों का पालन करते हुए, लेकिन ताजे झोके वाले विचारों से भरा नई शिक्षा नीति का प्रारूप यह कहता है- खासकर पाठ्यक्रम से इतर या सह पाठ्यक्रम गतिविधियां नहीं होनी चाहिए। अन्य सभी गतिविधियों को भी पाठ्यक्रम का ही हिस्सा माना जाना चाहिए। प्रारूप में आगे कहा गया है- छात्रों को अपनी पंसद के विषय चुनने के लिए बहुत ही लचीला अवसर दिया जाएगा, खासकर माध्यमिक स्तर के विद्यालयों में जिनमें शारीरिक शिक्षा, कला और व्यावसायिक शिल्प भी शामिल हैं। ताकि वे खुले मन से अपने पसंदीदा जीवन व अध्ययन का मार्ग चुन सकें ।

आजीवका के साधन

नई शिक्षा नीति के प्रारूप में युवा पीढ़ी के लिए पेशा व आजीविका के स्रोत तैयार करने के भी सुझाव दिए गए हैं। “सभी छात्रों के लिए व्यावसायिक पाठ्यक्रम अनिवार्य होगा, जो कि औपचारिक पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा होगा और प्रशिक्षुओं को कृषि, इलेक्ट्रानिक, स्थानीय व्यापार व हस्तशिल्प आदि विषयों की गहन जानकारी दी जाएगी। स्कूल के वर्षों में छात्रों को विभिन्न पेशे के बारे में बताया जाएगा, और उन्हें समय समय पर रोजगार की दुनिया में होने वाले परिवर्तन और उसे जुड़े पाठ्यक्रमों व विकल्पों के बारे में अवगत कराया जाता रहेगा।”

भारतीय शास्त्रीय भाषाएं

हालांकि सोशल मीडिया में सक्रिय व राय बनाने का दावा करने वाले लोग नई शिक्षा नीति में ‘हिंदी’ को थोपने  की बहस में उलझे हैं, लेकिन वास्तव में नई शिक्षा नीति के प्रारूप में भारतीय शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात कही गई है। प्रारूप के एक अंश में यह कहा गया है- संस्कृत के अलावा, तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, ओडिया, पाली, पर्सियन और प्राकृत जैसी मूल भारतीय शास्त्रीय भाषाओं की पढ़ाई वृहद रूप में स्कूलों में उपलब्ध होंगी। इसमें आगे यह भी सुझाव दिया गया है कि इन भाषाओं के महत्वपूर्ण साहित्यों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। उदाहरण के लिए शास्त्रीय तमिल में संगम काव्य, पाली में जातक कथाएं, शास्त्रीय ओडिया में सरला दासा, कन्नड़ में राघवन के महाकाव्य, हरिशचंद्र के काव्य, पर्सिया में अमीर खुसरो और हिंदी में कबीर के दोहे आदि।

कला व संगीत के जरिए शिक्षा की उपयोगिता बढ़ाना

कहा गया है कि वे वैज्ञानिक या इंजीनियर जो संगीत या कला के करीबी होते हैं ज्यादा उपयोगी होते हैं। नई शिक्षा नीति के प्रारूप में कुछ ऐसी ही योजना बनाई गई है। “सभी छात्रों को प्रारंभिक स्तर से ही भारतीय शास्त्रीय संगीत (कर्नाटकी या हिंदुस्तानी ) से जुडे़ अलाप, गायन या ताली के जरिए  नोट्स,  स्केल्स, राग और लय से परिचित कराया जाएगा। इसके साथ ही स्थानीय लोक संगीत, कला व हस्तशिल्प की भी शिक्षा दी जाएगी।” इसके आगे प्रारूप में नाट्य मंचन, काव्यपाठ, चित्रकला, रेखा चित्र, व मूर्ति कला के साथ व्यावसायिक कला प्रशिक्षण जैसे – बढ़ईगिरी, कढ़ाई, सिलाई और कपड़ा तैयार करने पर भी जोर दिया गया है।

शोध अब केंद्रीय महत्व में

नई शिक्षा नीति के प्रारूप में शोध को विशेष महत्व दिया गया है। एक नये नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ)  के जरिए अब प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय और उसके आगे विश्व विद्यालय के स्तर तक शिक्षा व्यवस्था में शोध पर निवेश करने पर बल दिया जाएगा। विज्ञान, तकनीक, सामाजिक विज्ञान और कला एवं मानविकी शिक्षा की बुनियाद मजबूत की जाएगी। सामाजिक विज्ञान व मानविकी जैसे विषयों, जिन पर अभी ज्यादा ध्यान नहीं गया है, को मजबूत करने के साथ ही एनआरएफ विविध विषयक प्रकृति के शोध संस्थानों या प्रयासों के बीच समन्वय का काम करेगा।

निष्कर्ष

उपर जिन विषयों पर हमने चर्चा की है वे नई शिक्षा नीति के कुछ खास बिंदू हैं। इसके अतिरिक्त दस्तावेज में विस्तृत रूप से भी कई विषयों को रखा गया है जिस पर चर्चा हो रही है। जैसे प्रस्तावित नई शिक्षा नीति में यह विवरण दिया गया है कि किस तरह नये शिक्षा ढांचे के अनुरूप शिक्षकों को तैयार किया जाए। किस तरह से संसाधन जुटाए जाएं। शिक्षा के विभिन्न स्तर पर बच्चों के अभिभावकों की सहभागिता कैसे बढ़ाई जाए। इसके पहले 1986 में नई शिक्षा नीति आई थी, जिसमें बाद में 1992 में कुछ सुधार किए गए। इतने वर्ष बाद अब इस नई शिक्षा नीति का प्रारूप सामने आया है। यदि हमनें इसे सिर्फ हिंदी को थोपने तक की बहस पर छोड़ दिया और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा या बहस नहीं की तो यह नई व भावी पीढ़ी के साथ न्याय नहीं होगा। क्योंकि यह उनकी बेहतरी के उद्देश्य से ही लाया गया है।

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