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वंशवाद और हक की राजनीति के अंत होने का शंखनाद

Defeat of dynasty Indian politics

वर्ष 2019 कर चुनाव अभियान अद्वितीय था। मोदी का रथ निकला और कई बड़े नाम और बड़े परिवार अपने ही गढ़ में धराशायी हो गए। यह वंशवाद और हक की राजनीति के अंत होने का शंखनाद है, जो भारतीय व्यवस्था में गहरे जमे हुए थे।  यहां हम कुछ वैसे बड़े नाम दे रहे हें जो अपने ही गढ़ में प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव अभियान के सामने टिक नहीं पाए।

अमेठी में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

इसमें कोई शक नहीं कि इस चुनाव में जो सबसे बड़ा नाम मोदी के सामने धराशायी हुआ वह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही हैं। राहुल गांधी को अमेठी से स्मृति ईरानी ने हराया, जो 1967 से ही कांग्रेस के परिवार की सीट मानी जाती थी।

कलबुर्गी से कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में एक पहचाना हुआ चेहरा मल्ल्किार्जुन खडगे, जीवन में पहली बार चुनाव हारे है और वह भी उस क्षेत्र से जो वर्षों से कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है।

गुना से कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया

सिंधिया परिवार का एक ऐसा किला गुना जहां से स्वयं ज्योतिरादित्य पिछले चार चुनाव जीत चुके थे। उनके पिता स्वर्गीय माधव राव सिंधिया भी चार बार वहां से जीत कर संसद पहुंच चुके थे और उनकी दादी राजमाता सिंधिया भी छह बार गुना का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुकी थीं। लेकिन 2019 में सिंधिया परिवार का यह किला ढह गया और वहां से भारतीय जनता पार्टी जीत गई।

कोलार से कांग्रेस के के एच मुनियप्पा

कोलार से सात बार के सांसद रहे पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री के एच मुनियप्पा को भी 2019 के चुनाव में धूल चाटनी पड़ी।

पटना साहेब से कांग्रेस के शत्रुघ्न सिन्हा

2019 में आम चुनाव की घोषणा के समय भाजपा से कांग्रेस में गए पटना साहेब से दो बार के सांसद रहे फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा को भी हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें भाजपा के रविशंकर प्रसाद ने आसानी से मात दे दी।

रोहतक से कांग्रेस के दीपेन्द्र सिंह हुड्डा

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के बेटे दीपेन्द्र सिंह हुडा रोहतक से लगातार तीन बार कांग्रेस के सांसद रहे। उसके पहले उनके पिता भी इस क्षेत्र से चार बार संसद में पहुंचे थे। लेकिन 2019 में दीपेन्द्र सिंह हुड्डा भी चारो खाने चित हो गए।

अनंतनाग से पीडीपी के नेता मेहबूबा मुफ्ती

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता मेहबूबा मुफ्ती अनंतनाग से दो बार सांसद रह चुकी थी। उसके पहले उनके पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद भी कांग्रेस के टिकट पर एक बार अनंतनाग से सांसद रह चुके हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की वंशवाद के खिलाफ  लड़ाई का असर यहां अनंतनाग में भी दिखा और मेहबूबा मुफती यहां से चुनाव हार गई।

मधेपुरा से आरजेडी के शरद यादव

पूर्व जेडीयू अघ्यक्ष व इस बार राष्ट्रीय जनता दल के टिकट से लड़े शरद यादव मधेपुरा से हार गए। वे यहां से पहले चार बार जीत चुके थे।

कन्नौज से सपा की डिंपल यादव

कनौज से मुलायम सिंह यादव की बहु डिंपल यादव की हार परिवारवाद पर आधारित राजनीति को एक बड़ा धक्का है। सपा अध्यक्ष व उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव महागठबंधन के बावजूद अपनी पत्नी को नहीं जीता  सके।

बदायूं से सपा के धर्मेन्द्र यादव

सपा के वरिष्ठतम नेता मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेन्द्र यादव भी बदायूं से चुनाव नहीं जीत सके। वे यहां से दो बार सांसद रह चुके थे।

मांड्या से जेडीएस के निखिल कुमारास्वामी

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के पौत्र निखिल कुमार स्वामी जेडीएस के गढ़ मांड्या से ही जीत हासिल नहीं कर सके।

इस तरह 2019 के चुनाव में वंशवाद के खिलाफ जनता का निर्णायक एवं स्पष्ट विचार सामने आया। जहां परिवार के नाम पर या जनता पर अपना हक जता कर वर्षों से लोग अपने लिए सुरक्षित सीटें लेकर इतरा रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व ने अंततः देश में सच्चे लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

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