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नागरिकता संशोधन बिल पर फैलाये जा रहे झूठों का पर्दाफ़ाश

आज देशभर में Citizenship Amendment Bill, 2019 चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बिल का उद्देश्य पाकिस्तान,अफगानिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित किए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत में शरण देना है और उनके लिए Naturalization Period को 11 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष करना है। इस संबंध में भ्रम फैलाने और भीड़ को उकसाने के लिए  गलत प्रचार किये जा रहे हैं।

CAB के बारे में फैलाई जा रही Myths का खुलासा करना आज समय की मांग है।

दावा- यह अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार को violate करता है।
  • यह सच है कि आर्टिकल 14 लोगों को समानता और कानून के समक्ष समान संरक्षण प्रदान करता है। इस प्रकार यह सुनिश्चित करता है कि धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता है लेकिन इसमें एक अपवाद है।
  • आर्टिकल 14 में Reasonable Classification का प्रावधान है जो समानता के सिद्धांत को शिथिल (Relax) करता है। इस प्रकार,  Affirmative Action या  Positive Discrimination संभव है,अगर उचित क्राइटेरिया के आधार पर Classification किया गया हो। यानि Reasonable Classification के साथ बनने वाले कानूनों पर कोई रोक नहीं है।
  • Reasonable Classification के कारण भारत में जाति के आधार पर आरक्षण और अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकार संभव हैं।
  • यहां तक ​​कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस कंसेप्ट को Underline किया है। Ram Krishna Dalmia v. Justice S R Tendolkar मामले में कोर्ट ने कहा- “अब यह अच्छी तरह मान्य हो चुका है कि आर्टिकल 14 Class Legislation की इजाजत नहीं देता है लेकिन Legislation के उद्देश्य से यह Reasonable Classification पर रोक नहीं लगाता है।”
  • इसने “intelligible differentia” concept को सामने रखा है, जो ऐसे व्यक्तियों या चीजों को अलग करती है, जिन्हें समूह से बाहर रखे गए अन्य लोगों से एक साथ जोड़ा जाता है और साथ ही उस उद्देश्य के साथ तार्किक संबंध होना चाहिए, जिसे कानून द्वारा हासिल करना है।
  • इसके अलावा Parisons Agrotech (P) Ltd. v. Union of India मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि समानता का नियम geographical classification पर रोक नहीं लगाता है,बशर्ते geographical units के बीच difference हासिल किए जाने वाले उद्देश्य से तार्किक संबंध हो।
  • इस प्रकार, इन तीन देशों के persecuted minorities एक reasonable classification बनाते हैं क्योंकि ये लोग इन इस्लामिक देशों में systematic attacks, persecution और communal violence के शिकार हुए हैं।
दावा- CAB मुस्लिम विरोधी है और यह उनके साथ भेदभाव करता है।
  • भारतीय मुसलमान इस amendment से किसी तरह प्रभावित नहीं हैं। वे भारत के वैध नागरिक हैं और वे हर प्रकार के लाभों के हकदार हैं। यह बिल शरणार्थियों से संबंधित है,जो विदेशी नागरिक हैं।
  • भारत उन शरणार्थियों को भी स्वीकार करता है जो मुस्लिम हैं। इस प्रोसेस को Foreigners Act, 1946 जैसे अन्य एक्ट के तहत हैंडल किया जाता है। इस संबंध में appropriate bodies को किसी की नागरिकता के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है।
  • भारत ने यह भी घोषित किया है कि 2015 के बाद भारत आने वाले किसी भी शरणार्थी को उनके किसी धर्म विशेष के बावजूद उपरोक्त उल्लेखित एक्ट के तहत जांच की जाएगी।
  • इस मुद्दे पर हंगामा कर रहे राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा सवाल यह है कि अगर आप भारत के अल्पसंख्यकों के समर्थक हैं और उन्हें सुरक्षित रखना चाहते हैं तो फिर आप पड़ोसी देशों में persecuted minorities का विरोध क्यों करते हैं?
दावा-मुसलमानों को भी persecute किया जाता है तो अहमदिया और शिया को अनुमति क्यों नहीं
  • Persecuted religious minorities और ethnic violence के बीच एक बुनियादी अंतर है।
  • अहमदिया और शिया, संप्रदायिक और जातीय हिंसा के शिकार हैं, जिनका religious persecution से कोई लेना-देना नहीं है। इस तरह, उनकी तुलना हिंदुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों जैसे उत्पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यकों से नहीं की जा सकती।
  • कानूनी दृष्टिकोण से अगर हम धार्मिक उत्पीड़न के साथ जातीय हिंसा के मामलों को शामिल करते हैं, तो इसे “reasonable classification” नहीं कहा जा सकता है और यह आर्टिकल 14 का उल्लंघन होगा।
दावा- US Commission for International Religious Freedom (USCIRF) बिल को गलत मानता है।
  • भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि USCIRF की ऐसी टिप्पणी न तो accurate है और ना ही warranted। यह देखते हुए कि इसका पिछला रिकॉर्ड भारत की धार्मिक स्वतंत्रता पर टिप्पणियों से भरा है।
  • इसके अलावा, यह बेहद खेदजनक है कि पड़ोसी देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मुद्दे पर USCIRF ने, न तो कभी चिंता व्यक्त की और न ही किसी देश के गृह मंत्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोई सनसनीखेज बयान जारी किया।
  • भारत और भारत के लोगों को इस प्रकार की बॉडीज के बयान को सच नहीं मानना चाहिए।
दावा- गैर-स्थानीय शरणार्थियों के आने से Northeast की स्थिति खराब होगी
  • सरकार Northeast के लोगों की जरूरतों के प्रति सदैव संवेदनशील रही है। CAB में एक specific provision है। Sixth Schedule के तहत autonomous tribal regions को इससे अलग रखा गया है। इसका मतलब है कि असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के क्षेत्रों को इससे बाहर रखा जाएगा।
  • इसके अलावा, इनर लाइन परमिट वाले राज्यों को बाहर रखा गया है। अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिजोरम राज्यों के लिए इनर लाइन परमिट आवश्यक है। इस प्रकार persecuted refugees को यहां नहीं बसाया जाएगा।
  • इसके अलावा, पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष अधिकार प्रदान करने वाला आर्टिकल 371 इससे प्रभावित नहीं होगा। अधिकारों में customary laws , land rights, rights of local bodies, local representation आदि का उपयोग शामिल है।
दावा- संसद के पास नागरिकता संबंधित कानून बनाने की शक्ति नहीं है।
  • यह गलत assumption है कि नागरिकता का विषय संविधान में निहित है और संसद के पास इस मुद्दे पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं है लेकिन यह बात वास्तविकता से काफी दूर है।
  • संविधान के आर्टिकल 11 के अनुसार “संसद कानून के जरिए नागरिकता के अधिकार को Regulate करती है। नागरिकता के acquisition और termination के संबंध में कोई भी प्रावधान करने और नागरिकता से संबंधित अन्य सभी मामलों के लिए इस भाग के कुछ भी पूर्ववर्ती प्रावधान संसद की शक्ति से अलग नहीं होंगे ”
  • यहां तक की भारतीय संविधान की Drafting Committee के अध्यक्ष डॉ. बी आर अम्बेडकर ने कहा था- “इस विशेष आर्टिकल (आर्टिकल 5, अब आर्टिकल 11) का उद्देश्य देश के लिए नागरिकता का स्थायी कानून बनाने के लिए नहीं है। नागरिकता का स्थायी कानून बनाने का अधिकार संसद पर छोड़ दिया गया है ”
  • आइए, हम तर्क के आधार पर सोचें। नागरिकता एक dynamic issue है और बदलती दुनिया के लिए एक dynamic citizenship policy की आवश्यकता है। क्या 1949 में बना संविधान, 21वीं सदी के मुद्दों और चुनौतियों से निपटने में सक्षम है? इस तरह, यह अधिकार संसद को दिया गया है क्योंकि साधारण बहुमत से संशोधनों को पेश करना आसान होता है।
दावा- CAB भारत को विभाजित करने वाली Two Nation Theory को बढ़ावा देता है।
  • CAB, Two Nation Theory को बढ़ावा देने के बदले Two Nation Theory के पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान करता है।
  • घोषित इस्लामी देशों में धार्मिक अल्पसंख्यक प्रताड़ना के शिकार हैं, जहां उनके लिए कोई रास्ता नहीं बचा है। ये लोग Two Nation Theory के कारण उत्पन्न घृणा के शिकार हैं।
  • कांग्रेस ने भारत के विभाजन स्वीकार किया और Two Nation Theory को लागू कर धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए ऐसी cruel conditions का निर्माण किया।
  • इसके विपरीत, नरेंद्र मोदी सरकार सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास की नीति पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य भारतीय मुसलमानों को अन्य सभी के साथ मिलाकर आगे ले जाना है।
दावा- श्रीलंकाई तमिलों और तिब्बतियों जैसे अन्य शरणार्थियों का क्या होगा?
  • सरकार का स्पष्ट मानना है कि अन्य सभी शरणार्थियों की समस्याओं का समाधान Foreigners Act 1946 जैसे मौजूदा कानूनों के तहत किया जाएगा और पहले से स्थापित प्रक्रियाओं का पालन किया जाएगा।
  • CAB विशेष रूप से persecuted religious minorities पर ध्यान केंद्रित करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि शरणार्थियों के अन्य वर्गों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा।
दावा- रोहिंग्या के लिए यही कानून क्यों नहीं लागू है।
  • रोहिंग्या और अन्य शरणार्थियों के बीच बुनियादी अंतर है।
  • CAB विशेष रूप से तीन देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के लिए है, जहां के अल्पसंख्यकों ने विभाजन का दंश झेला है और उन्हें सताया गया है। रोहिंग्या इस श्रेणी में नहीं आते हैं।
  • इसके अलावा, ऐसी रिपोर्ट हैं कि रोहिंग्या भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं। रोहिंग्याओं का ISIS और LeT जैसे आतंकवादी संगठनों से संपर्क है। भारत उन लोगों को कैसे स्वीकार करेगा जो भारत विरोधी गतिविधि में लिप्त हैं?
  • भारत ही नहीं, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भी कई बार रिकॉर्ड पर कह चुकी हैं कि रोहिंग्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
Historical Injustice को दुरूस्त करने का मौका
  • Broader Perspective में देखे तो विभाजन ने लगभग एक करोड़ लोगों को सीमाओं पर पार करने और paupers के रूप में शरण लेने का कारण बना। तत्कालीन पाकिस्तान में रहने के लिए फैसला करने वालों को धार्मिक कानूनों द्वारा शासित एक इस्लामी देश मिला।
  • लोगों के उत्पीड़न को निम्नलिखित बिंदुओं से देखा जा सकता है-
  • Farahnaz Ispahani ने अपने लेख Cleansing Pakistan of its Minorites में दावा किया- “1947 में विभाजन के समय पाकिस्तान की लगभग 23 प्रतिशत आबादी गैर-मुस्लिमों की थी और अब यह घटकर सिर्फ तीन फीसदी रह गई है।
  • बांग्लादेशी researcher अब्दुल बरकत ने अपनी एक स्पीच में दावा किया- “औसतन 632 हिंदू हर दिन और साल में 230,612 बाहर चले गए। उनका कहना है कि अगले 30 वर्षों में बांग्लादेश में कोई हिंदू नहीं बचेगा। ”
  • यह हिंदू लड़कियों के अपहरण और पाकिस्तान में जबरन धर्म परिवर्तन की लगातार आ रही खबरों के अलावा है।
  • ऐसा नहीं है कि इस बारे हमें आज पता चला है। 1950 के दशक में बंगाली दलित नेता जोगेंद्रनाथ मंडल (पूर्वी पाकिस्तान में मंत्री) को हिंदुओं के उत्पीड़न के कारण भारत आने को मजबूर होना पड़ा था। अगर कोई मंत्री पूर्वी पाकिस्तान में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा था तो आम हिंदुओं की दुर्दशा की कल्पना की जा सकती है।
  • ऐसी उम्मीद थी कि भारत और नये पड़ोसी देश अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे। भारत अपने देश के अल्पसंख्यकों के साथ मजबूती से खड़ा रहा जबकि पड़ोसी देशों ने ऐसा नहीं किया।
  • कांग्रेस नेता और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने Nehru-Liaqat Pact पर हस्ताक्षर किए थे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा होगी। जब ऐसा नहीं हुआ तो क्या कांग्रेस को खुद ही इस बात पर सहमत होना चाहिए कि भारत में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा मिले और Nehru-Liaqat Pact को सही अर्थों में लागू किया जाए?
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