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जानिये – कैसे ममता सरकार में बंगाल को बर्बाद किया जा रहा है

Bengal Mamata Banerjee

चुनाव के बाद भी पश्चिम बंगाल में हिंसा जारी है। टीएमसी के कार्यकर्ता लगातार बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट कर रहे हैं, उनकी हत्या कर रहे हैं। बंगाल में रोज ही लोग मर रहे हैं। ताजा घटना है कि बीजेपी के तीन कार्यकर्ताओं को टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने बशीरहाट इलाके में गोली मार दी।

केंद्रीय गृहमंत्रालय लगातार बंगाल से हिंसा की रिपोर्ट प्राप्त कर रहा है। बंगाल के बशीरहाट में अपने कार्यकर्ताओं की हत्या के विरोध में भाजपा काला दिवस मना रही है। केंद्र सरकार ने हिंसा की घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को कानून व्यवस्था और शांति बनाए रखनी की सलाह दी है. साथ ही ऐसे अधिकारी जो अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं कर रहे हैं उनके खिलाफ भी कार्रवाई करने को कहा है। तृणमूल के लोग विजय जुलूस निकाल रहे हैं लेकिन बीजेपी को इसके लिए रोका जा रहा है। साफ है कि ममता पूरी तरह से निर्मम होकर सत्ता चला रही हैं।

बंगाल को लेकर दिल्ली में भी काफी तेज सरगर्मी है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने 10 जून को प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मुलाकात कर बंगाल की वर्तमान स्थिति से अवगत कराया है।

शुरू से ही ममता निरंकुश

2011 से ही ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की राजनीति की धुरी बनी हुई हैं। हालांकि वह इन वर्षों में राज्य में विकास के बड़े बड़े दावे करती रही हैं, लेकिन सच्चाई ठीक से इसके विपरीत, बल्कि स्थिति निराशाजनक ही रही है।

जबरन वसूली वाले सिंडिकेट की सत्ता

कौन नहीं जानता कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की नाक के नीचे एक जबरन वसूली वाला सिंडिकेट काम करता है। चाहे वह इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट हो, कोई सेवा क्षेत्र का काम हो या फिर कोई सरकारी परियोजना ही क्यों ना हो, ममता बनर्जी सरकार की शह पर चलाए जा रहे सिंडिकेट के अदृश्य हाथ गुंडा टैक्स के रूप में अपना हिस्सा ले ही जाते हैं। उन्होंने इस तरह से दहशत फैला रखा है कि उनको कट दिए बिना कोई भी ठेकेदार काम करने की सोंच भी नहीं सकता। यदि कोई हिम्मत करे भी तो तृणमूल के गुंडे फौरन उन्हें सबक सीखा देते हैं। यही कारण है कि ग्लोबल इनवेस्टमेंट समिट कराए जाने के बावजूद बंगाल में कोई विदेशी या घरेलू निवेशक आने के लिए तैयार नहीं है।

बहुचर्चित शारदा, रोज वैली जैसे घोटालों, जिसमें तृणमूल के नेता और राज्य के कई मंत्री संलिप्त पाए गए, ने न सिर्फ विकास की पूरी प्रक्रिया को ही बाधित कर दिया, बल्कि बंगाल के लाखों लोगों की जीवन भर की कमाई भी लूट लिया। हमने देखा है कि चिटफंड घोटाले की जांच में पूछताछ के लिए कोलकाता गई सीबीआई की टीम से राज्य के एक पुलिस अधिकारी को बचाने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी किस हद पर उतर आईं थी।

सहयोग आधारित संघीय व्यवस्था पर कुठाराघात

दिसंबर 2018 में ममता बनर्जी ने राज्य के अधिकारियों को यह निर्देश दिया कि वे केंद्र सरकार के साथ किसी भी तरह के आकड़ों को साझा न करे, यह सहकारी संघवाद के सिद्धांत पर सीधा हमला था। आखिर राज्यों के आकड़े केंद्र के साथ साझा करने में क्या खतरा था? फिर ममता बनर्जी का वह नाटकीय बयान कौन भूल सकता है जब उन्होंने दिसंबर 2016 में कहा था कि सेना उनका तख्तापलट करने की कोशिश कर रही है,जबकि सेना के कुछ अधिकारी महज टोल के आकड़े इकट्ठा कर रहे थे।

हिंसा की राजनीतिक संस्कृति

वाम मोर्चा ने बंगाल में जिस हिंसा की राजनीतिक संस्कृति की शुरूआत की थी वह ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद खत्म होने के बजाय और भयानक रूप से बढ़ गई है। सच्चाई तो यह है कि ममता बनर्जी ने खुद सत्ता में पहुंचने के लिए सिंगुर और नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ खूनी आंदोलन का रास्ता अपनाया था। तब से यह तृणमूल सत्ता में बने रहने के लिए हिंसा का खुलेआम प्रयोग करती आ रही है। पिछले साल कोलकाता हाईकोर्ट को इसी हिंसा के कारण पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव को रद्द करना पड़ा। यह ममता बनर्जी के शासन पर बहुत बड़ा कलंक था। इससे साबित हुआ कि पश्चिम बंगाल की सरकार एक स्थानीय स्तर का चुनाव भी शांतिपूर्ण तरीके से नहीं करा सकती। उस पंचायत चुनाव में हिंसा और गुंडागर्दी का यह आलम था कि 34 प्रतिशत सीटों पर तृणमूल के खिलाफ कोई उम्मीदवार उतरा ही नहीं। लगभग 2000 पंचायतों में सत्तारूढ दल बिना किसी विरोध के ही विजयी घोषित कर दिया गया।

बदतर होती वित्तीय व्यवस्था- राज्य कर्ज में भंवर में

पहले से ही खस्ता हालत में पहुंच चुके पश्चिम बंगाल के आर्थिक हालत दिन प्रति दिन और खराब होते जा रहे हैं। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोई दीर्घकालिन योजना बनाकर राज्य का विकास करने के बजाय अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए एक वर्ग को खुश करने पर ही खर्च करने में लगी हैं। यही कारण है कि 2000-2001 से लेकर 2017-18 तक राज्य कर्ज के जाल में पूरी तरह फंस चुका है। ममता शासन में डेब्ट-जीडीपी अनुपात घटकर वहीं पहुंच गया है जहां वाममोर्चे की सरकार के अंतिम पांच साल में था।

प्रेस इनफोरमेशन ब्यूरो यानि PIB द्वारा प्रकाशित आकड़ों के अनुसार राज्य सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में विकास के मद में व्यय और जीएसडीपी में पूंजी परिव्यय का अनुपात न्यूनतम है। आय बढ़ाने में नाकाम रहने और राजनीतिक लाभ के लिए धुंआधार खर्च करने की ममता की प्रवृति के कारण बंगाल में पूंजीगत परिव्यय पर जैसे अंकुश लग गया है।

उद्योगों में तालाबंदी

एक तो पहले से पश्चिम बंगाल का परंपरागत जूट उद्योग संघर्ष कर रहा था, उस पर से ममता की उद्योग के खिलाफ नीति ने और बेड़ागर्क कर दिया। यदि हम 2010 के आकड़ें से तुलना करें तो 2013 तक, जब ममता का सत्ता उत्थान परवान चढ़ रहा था, उद्योगों में 97 प्रतिशत तक गिरावट आ चुकी थी। आगे के वर्षों मे यही स्थिति बनी रही। दो बड़े औद्योगिक इकाइयां, डनलप इंडिया की शाहगंज इकाई और हिंदुस्तान मोटर्स की उत्तरपारा इकाई बंद हो गईं। इस तरह रोजगार और आय में पश्चिम बंगाल के उद्योगों का योगदान लगातार कम होता चला गया।

निवेश: प्रस्ताव और वास्तविक निवेश में भारी अंतर

बड़े उद्योगों को लुभाने की ममता की कोशिश का कोई परिणाम नहीं निकला। 2018 में बंगाल बिजनेस समिट पर बहुत शोर मचाया गया, निवेश के बड़े बड़े दावे किए गए लेकिन वास्तविक निवेश और घोषणाओं के बीच काफी अंतर रहा। इसी तरह 2017 और 2016 में भी बंगाल में निवेश के बड़े दावे किए गए लेकिन वास्तविकता कुछ और ही रही। निवेश की घोषणाएं बस घोषणाएं तक ही सीमित रहीं।

अर्थव्यवस्था में सुधार की रफ्तार सुस्त

आधुनिक अर्थव्यवस्था में सुधार का मतलब कृषि पर निर्भरता कम और उद्योग व सेवा क्षेत्र का विकास अधिक होता  है। लेकिन पश्चिम बंगाल में अभी भी कृषि पर ही निर्भरता बनी हुई है। राज्य सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 21.54 प्रतिशत है, जबकि भारत की जीडीपी में कृषि का औसत योगदान 15.40 प्रतिशत है। स्पष्ट है कि ममता के शासन में अभी भी आर्थिक क्षेत्र में कोई बड़ा सुधार नहीं हो पाया है।

जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी गरीबी रेखा से नीचे

ममता बनर्जी गरीब-गरीब तो चिल्लाती हैं, लेकिन गरीबों को गरीबी रेखा से उपर ले जाने के लिए कुछ खास नहीं करती। इसका उदाहरण है कि अभी भी बंगाल में 19.98 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। यह ससटेनिबल डेपलपमेंट गोल 1 के खिलाफ है। बिहार के बाद सबसे अधिक जनसंख्या का घनत्व वाले इस राज्य की यह तस्वीर सचमुच दयनीय है।

स्वच्छता के मामले में भी बंगाल पीछे

केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 के अनुसार देश के 25 सबसे गंदे शहरों में से 18 पश्चिम बंगाल के ही हैं। यह आकड़ा दिखाता है कि स्वच्छता के प्रति बंगाल सरकार कितनी लापरवाह है।

राजनीति पहले जनता बाद में

ममता बनर्जी ने जब यह घोषणा की कि वह प्रधानमंत्री द्वारा  घोषित आयुष्मान भारत योजना बंगाल में नहीं लागू करेंगी, तो स्पष्ट हो गया कि बंगाल के मुख्यमंत्री के लिए राजनीति पहले है जनता की सेवा बाद में। आयुष्मान योजना देश के 10 करोड़ गरीब परिवारों को को मुफ्त इलाज के लिए 5 लाख रुपये तक की स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा देता है। पूरे देश में लाखों लोग इसका फायदा उठा रहे हैं। आयुष्मान के जरिए सरकारी और निजी दोनों तरह के अस्पतालों में इलाज हो सकता है।

स्पष्ट है कि ममता बनर्जी ने जो ‘परिबर्तन’ का नारा देकर सत्ता प्राप्त किया था बस वह नारा ही बना रह गया। पश्चिम बंगाल के लोगों के जीवन में कोई सुखद परिवर्तन नहीं आया। बल्कि रोज रोज की हिंसा और गुंडागर्दी से आम लोग पिस ही रहे हैं।

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