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एशियाई डेवलपमेंट बैंक का अनुमान – भारत में नहीं बढ़ेगी महंगाई

ADB report inflation forecast India

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार इस वर्ष भी महंगाई नहीं बढ़ने देगी यह अनुमान एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने व्यक्त किया है। हॉल ही में जारी एक रिपोर्ट में एडीबी ने कहा है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की मुद्रास्फीति 4.10 प्रतिशत रह सकती है। पहले एडीबी ने ही भारत में मुद्रा स्फीति की दर 4.30 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया था। एडीबी के अनुसार भारत की मुद्रा स्फीति कम रहने से दक्षिण एशिया में भी मुद्रा स्फीति कम रहेगी।

स्रोत – एडीबी

एडीबी ने दक्षिण एशिया के लिए मुद्रास्फीति दर का अनुमान 4.70 प्रतिशत से घटाकर 4.50 प्रतिशत कर दिया है। एडीबी का कहना है कि खाद्य पदार्थ की मुद्रास्फीति में अनुमान से कम तेजी होगी। और अक्टूबर 2018 के बाद रुपये की मजबूती तथा जीडीपी वृद्धि दर के संशोधित अनुमान के कारण भारत की मुद्रास्फीति का अनुमान घटाकर 2019-20 के लिये 4.10 प्रतिशत तथा 2020-2021 के लिये 4.40 प्रतिशत किया जाता है।

रिजर्व बैंक का अनुमान

इसके पहले भारतीय रिजर्व बैंक ने भी जून में जारी अपनी रिपोर्ट में यह अनुमान जताया था कि भारत में मुद्रा स्फीति की दर अप्रैल से सितंबर 2019 के दौरान 3.0 से 3.1 प्रतिशत रहेगी और अगले छह माह के दौरान 3.5 से 3.8 प्रतिशत रहेगी। रिजर्व बैंक की मोनिट्री पालिसी कमेटी लगातार मुद्रा स्फीति पर नजर रखती है। पाकिस्तान में इस समय मुद्रा स्फीति की दर 9 प्रतिशत और बांग्लादेश की मुद्रा स्फीति 5.9 प्रतिशत है।

पहले कार्यकाल से ही मंहगाई पर अंकुश

दरअसल मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल से ही मंहगाई पर अंकुश लगा रखा है। इसके लिए सरकार में शीर्ष स्तर पर ही सतर्कता नहीं बरती गई है , बल्कि विभिन्न तंत्रों द्वारा नीचे बाजार और वितरण प्रणाली को भी मजबूत रखा गया है। आइए देखते है कि सरकार ने वस्तुओं के मूल्यों को बढ़ने से रोकने के लिए कौन कौन से उपाय किए हैं।

जमाखोरों पर लगाम

2014 में सरकार आते ही दालों के दाम आसमान छूने लगे थे। सामान्य दाल की कीमतें 120 से 200 रुपये प्रति किलो पहुंच गई थी। देश में हाहाकार मचने लगा था। लेकिन मोदी सरकार अलर्ट थी। एक तरफ दलहन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए किसानों से आहवान किया गया और दलहन की अच्छी कीमतों के साथ साथ बोनस भी देने की घोषणा की गई

वहीं दूसरी तरफ पूरे देश में जमाखोरों को खिलाफ अभियान चला गया और दाल के निर्यातकों, आयातकों और प्रसंस्करण करने वाले सभी लाइसेंसधारियों के लिए स्टॉक की सीमा निश्चित कर दी गई। आज भी यह व्यवस्था लागू है । बाजार में जमाखोरों पर पूरी तरह से लगाम लगा हुआ है। 2015 में जब दाल संकट पैदा हुआ था, तब जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई से ही 5,801 टन दालें जब्त की गई थीं।

आयात-निर्यात में संतुलन

सरकार ने एक तरफ कृषि उत्पादों के निर्यात का एक नया लक्ष्य तय किया है, जिसके अनुसार वर्ष 2024 तक कृषि निर्यात 30 अरब डॉलर से बढ़ाकर 60 अरब डॉलर करना है, तो दूसरी तरफ सरकार बराबर यह ताकीद रखती है कि घरेलू उपभोग की जरूरतों का स्टॉक मौजूद रहे। इसलिए मोदी सरकार प्रोसेस्ड फूड आइटम के ही निर्यात पर जोर दे रही है और चावल, गेहूं, कपास, चीनी और कुछ अन्य अत्यंत आवश्यकता वाली चीजों के निर्यात पर समय समय पर रोक या प्रतिबंध लगाती रहती है, ताकि घरेलू बाजार में उनकी पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे। इसी तरह से कई खाद्य पदार्थ ऐसे हैं जिनके आयात पर भी रोक लगा दी जाती है। जैसे कि चीन से डेयरी प्रोडक्ट के आयात पर रोक लगाई गई है, ताकि हमारे दूध के उत्पादकों को थोपी हुई प्रतिस्पर्घा ना करनी पड़े।

किसानों को उपज का डेढ़ गुना कीमत

खाद्य पदार्थों की कीमतों में स्थिरता के लिए सबसे अधिक जरूरी है पर्याप्त घरेलू उपज। मोदी सरकार ने देश में जरूरत की लगभग सभी चीजों के उत्पादन के प्रति किसानों को प्रोत्साहित करने और उनकी आय बढ़ाने के लिए कृषि उपजों के न्यूनतम खरीद मूल्य को लागत से डेढ़ गुणा कर दिया है, ताकि किसान उसे उपजाने के लिए प्रेरित हों और देश को किसी भी खाद्यान्न के लिए आयात ना करना पड़े। मोदी सरकार ने खरीफ और रवी दोनों फसलों की न्यूतनम खरीद मूल्य को लागत से डेढ गुणा अधिक घोषित किया है। यही नहीं हाल ही में खरीफ फसलों के लिए घोषित खरीद मूल्यों में 1 से 9 फीसदी अतिरिक्त बढ़ोतरी की घोषणा कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने की है। किसान जब अधिक पैदावार करेंगे तो निर्यात भी बढ़ेगा और देश में खाद्यान्नों की कीमत भी नहीं बढ़ेगी। यही नहीं फलों और सब्जियों के दामों में भी स्थिरता लाने के लिए खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्रालय ने ‘ऑपरेशन ग्रीन’ चलाया है, जिसके तहत टमाटर, प्याज और आलू की पैदावार बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

कई अन्य उपाय

खाद्यान्नों के दामों को काबू में रखने के कुछ उपाय अप्रत्यक्ष हैं तो कुछ प्रत्यक्ष हैं। जहां सरकार मूल्य नियंत्रण के लिए सीधी कार्रवाई करती है। जैसे एसेंशियल कमोडिटीज एक्ट, कम्पटिशन कमीशन और फॅारेन ट्रेड रेगुलेशन जैसे कानून, जिनके जरिए सरकार दामों को बढ़ने से रोकने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष रूप से अपनाती है। सरकार के पास मूल्य नियंत्रण का एक सबसे मजबूत तंत्र सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी है, जिसके जरिए गरीबों को सीधे और बहुत ही कम दाम पर खाद्यन्न की उपलब्धता कराई जाती है।

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